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Ghazal

गजल

अच्छा-खासा खेल तमाशा,हम का जानी। उलटा-सीधा तहरे लिला,हम का जानी ।। एड़ी, दोरी, तिलया , चौरी- चाभा ले बा, धोखा के अब ताना-बाना हम का जानी। निकल गइल विश्वास समय का हाथो से, झूठे इहवाँ साँच कहाला हम का जानी । तहरा भरमावे आवे ला लूट$-पाट$, मिथक वादा खास बहाना हम का जानी। दाढ़ी - टोपी, चंदन - टीका हाय- हाय $, अइसन होलें भक्त -दिवाना हम का जानी। अतने भर बा,साँचो जगत के जौहर जी, लागल बाटे आना-जाना हम का जानी ।

गजल

कहीं बबूल के पतई, कहीं चिनार के पत्ता । धधक रहल बा ई देखीं ना देवदार के पत्ता।। केहू बा लूटे खसोटे में अब लसार के पत्ता । गुजारा बा करत इहवाँ केहू बहार के पत्ता ।। इहाँ विश्वास घाती लोग बा अपनो के ना देखीं, छिटाई तास के पत्ता ,नियर इतबार के पत्ता । बहुत चलाक ना बने के चाहीं सोंच लीं अपने, समय लुकावे ना गिन-गिन के खोली यार पत्ता। आजादी बा इहाँ चरे के लोग चरतो बा छुटा, केहू चबावता बेला, केहू अनार के पत्ता । खुलल बा आज के ताजा गजल में देख ल$ जौहर, कहीं एह पार के पत्ता कहीं ओह पार के पत्ता ।

गजल

भेंट रउवा से हमरा कहाँ ना भइल । बात ई बा कि लमहर बहाना भइल ।। देके संतोष हमरा के रो देलें ऊ, बारें कबहूँ के ऊहो निशाना भइल। कृष्ण जइसन सुदामा के मितवा रहे, बात पहिले के ह$ ई पुराना भइल । झूठ का बा, कहाँ बा, पता ई चलल, देह से आत्मा जब रवाना भइल । साँच कहला के हमरा नीमन फल मिलल, जे- जे आपन रहे, ऊ बेगाना भइल । आँकी जौहर के झांकी गजल-गीत में, साधना के बा कइसन दिवाना भइल ।

गजल

गुलाबी बा चेहरा शराबी नजर बा। घटा रंग में बाटे ठंका के डर बा ।। जवानी के दिन-रात,सपना कोढ़ाइल, कहीं कवनो प्रलय के अगवर खबर बा। घटा, फूल , पनघट बसंती हवा में, गमक जिंदगी के बा चउकसअसर बा। सजल रूप के हाट में बा खेलौना , गजब रूप मिथ्या के जादू-नगर बा। कबो रउवा कजरारी अँखियन से पूछीं, कहाँ साँच बाटे कहाँ गाँव-घर बा । सोहाना बा मौसम के हर छाव जौहर, जहाँ देखीं बिछली भरल ई डगर बा। ( पुरान 1972.ई0के डायरी से )

गजल

सुख-दुख मिल केभोग सखी रे। जीवन बा संयोग सखी रे ।। अपना खाये पर बा आफत, तबहूँ कर सहयोग सखी रे । बाँझ जवानी का गइला के, लोग मनाई सोग सखी रे । कुछ अपनन से गैर भला ह$, बात कहे ई लोग सखी रे । कहहूँ में आसान कहाँ बा, शब्दन के प्रयोग सखी रे । जौहर कहलें रजनीशे ई, भोग से आई योग सखी रे ।

गजल

नदी में हर तरफ खलबल बुझाता। मछरियन में बड़ा हलचल बुझाता।। शिकारी जाल लेके घात में बा, समय के ताक में चंचल बुझाता। लड़ा के माल चापत बा मजा से , छली बस रूप से निश्छल बुझाता। समुंदर पी गइल रखवार बनके, तबो देखीं सभे निर्जल बुझाता । भरम में बा तबो लबरा शिकारी, कहाँ केहू के ई कल-बल बुझाता। समय के साँच बा जौहर इहे अब, कहीं का बोरा के मखमल बुझाता।

गजल

अनबनी में अपनो घर कइसे फूँकाता देखलीं । फूल से फल से लदल गछिया कटाता देखलीं।। औने -पौने में बिकाता अब इहाँ कुछ आदमी, जे करे धोखाधरी अच्छा कहाता देखलीं । साधु अनशन में मरल गंगा छछन के रो पड़ल, देश भक्ति के नया सीमा खींचाता देखलीं । सामने बा लोभ-अहंकार के अब आदमी, राड़ के पचरा इहाँ हर दिन गवाता देखलीं। मोल- मर्यादा गवाँ के लोग बोलत बा इहाँ, झूठ अब साँचे नियर फरहर बुझाता देखलीं। खो गइल जौहर कहीं संवेदना बा आज-काल्ह, कुछ रोपाता कुछ कहाता,कुछ सुनाता देखलीं।

दोहा-गजल

टूटल दिल के तार बा, रूसल बा संगीत। कइसे गाईं रागनी , कइसे गाईं गीत ।। मिथ्या के बाजार में, भटकत बाटे नीत । कइसे जानी साधना,कइसे जानी प्रीत ।। भाँड़-भंडुवन के खेल में,पड़लबा राजनीत। कुर्सी ला नू प्रेम के, नेता ढ़ाहे भीत।। छउक जन अनका बल पर,हमरो मान$मीत। बल-बुध्दि अपने काम दी,ई ह$जग के रीत।। कलयुग के प्रभाव में,बदलल बा सब रीत । के बाटे मुदई इहाँ, के बा केकर मीत ।। मोह-भरम का गाँव में,खरा सिक्का बा चित। जौहर बाजी हार के, समुझीं आपन जीत ।।

गजल

रो-रो के सनेहिया का पथ में,जे आस के सावन तक पहुँचल । ई दर्द उहे बस जानी जे, चितकार के चितवन तक पहुँचल ।। के जीत गइल के हार गइल, के हार गइल के जीत गइल, निर्णय ई भइल जब ग्यान मिथक, संकल्प के चंदन तक पहुँचल । मन हार गइल,तन जीत गइल,तन जीत गइल मन हार गइल, जब नेह का सागर के पानी, विश्वास के आँगन तक पहुँचल । जब घोर अन्हरिया के पीड़ा, दुतकार गइल दुर्योंधन के, तब धर्म धरासाई हो के, टंकार के उपवन तक पहुँचल । हर साँस के बाटे ताजमहल, हर आस के कुरूक्षेत्र जहाँ, ओह गाँव के हम संसार कहीं, जब साध के मधुवन तक पहुँचल । जौहर के महाभारत में खड़ा, विश्वास के अर्जुन साखी बा, कब भीष्म पितामह के शय्या, हुँकार के दर्पण तक पहुँचल ।

गजल

रो-रो के सनेहिया का पथ में,जे आस के सावन तक पहुँचल । ई दर्द उहे बस जानी जे, चितकार के चितवन तक पहुँचल ।। के जीत गइल के हार गइल, के हार गइल के जीत गइल, निर्णय ई भइल जब ग्यान मिथक, संकल्प के चंदन तक पहुँचल । मन हार गइल,तन जीत गइल,तन जीत गइल मन हार गइल, जब नेह का सागर के पानी, विश्वास के आँगन तक पहुँचल । जब घोर अन्हरिया के पीड़ा, दुतकार गइल दुर्योंधन के, तब धर्म धरासाई हो के, टंकार के उपवन तक पहुँचल । हर साँस के बाटे ताजमहल, हर आस के कुरूक्षेत्र जहाँ, ओह गाँव के हम संसार कहीं, जब साध के मधुवन तक पहुँचल । जौहर के महाभारत में खड़ा, विश्वास के अर्जुन साखी बा, कब भीष्म पितामह के शय्या, हुँकार के दर्पण तक पहुँचल ।

गजल

कहाँ पूरा-पूरी ई ख़त्म होई, जिंदगी तय बा । भला जाई कहाँ सूरज से हट के,रौशनी तय बा।। अन्हरिया रात लम्बा चाहे, जतना भी घना होखे, फजिर होई चढ़ी सूरज,उजाला-ताजगी तय बा । कठिन मेहनत के दुख का कोख,से निकलेला सुख-सागर, समय साधक के ना छोड़े,खुशी के चाँदनी तय बा । कबो भगवान बन जाला,कबो शैतान क्षण भर में, महाभारत ओरइलो पर,रही ईआदमी तय बा । बनावट मोह-माया के,भरम जंजाल से निकलीं , केहू के साथ ना देले,समय के उर्वशी तय बा। गजल जौहर के जिनगी ह$गजल जिनगी के ह$जौहर, जगत में प्रेम के बाजत रही,ई डुग-डुगी तय बा ।

गजल

नेहिया का पथ में हमरा बाधा बनल बहाना । पीड़ा से मन के पंछी भटकल कहाँ-कहाँ ना।। सुध-बुध हेरा गइल बा,सुख-चैनअब कहाँ बा , जिनगी में चारोओरिया पसरल बा अब विराना। मेला में आदमी के अब बर्बाद$ जिन्दगी बा , नेहिया के बा छिटाइल अचके में ताना-बाना । कइसे दरद$ सुनाईं का लोर$ई हम देखाईं, लुट-पिट$के बा कहानी उजड़ल बाआशियाना। माटी में मिल गइल$बाअब सपना हँसी-खुशी के, टीसे ला मन में आ के वादा कइल पुराना । चंदन सुवास लेके उमकल कबो जे पछूआ, पिघिलेला वर्फ$मन के आ ढुँढ़े नया ठिकाना । विश्वासो घात$जौहर हमरा से के ना कइलस, घाती बा ई बतावल ,आपन बा के बेगाना ।

मनक़बत

हुसैने आली शहीदे आज़म,दुरूद तुम पर सलाम तुम पर । क़रारे क़लबे रसूले आज़म,दुरूद तुम पर सलाम तुम पर ।। निगाहे रहमत के ऐ मोकर्म,दुरूद तुम पर सलाम तुम पर । बहारे दीने रसूले अकरम,दुरूद तुम पर सलाम तुम पर।। तेरी शहादत की चाँदनी है,के ज़िंदा शाने अली-वली है । वक़ारे मिल्लत के हामी हमदम,दुरूद तुम पर सलाम तुम पर ।। नबी की ख़ातिर गला कटाया, मगर न सर को कभी झुकाया । उठाए कर्बल में तूँ ने हर ग़म, दुरूद तुम पर सलाम तुम पर ।। जवान बेटों की लाश लाये, ख़ुदा की मर्ज़ी पे मुस्कुराए । मगर न झुकने दिया था परचम, दुरूद तुम पर सलाम तुम पर ।। जवान क़ासिम की लाश रोए, कभी तो अकबर की प्यास रोए । जनाबे असग़र का पी गये ग़म, दुरूद तुम पर सलाम तुम पर ।। सलाम ऐ रहबरी के जौहर, सलाम ऐ नायबे पयमबर । सलाम करती है चश्मे पुरनम, दुरूद तुम पर सलाम तुम पर ।।

गजल

घटा,फूल,पनघट,हवा सामने बा। केहू अजनबी के पता सामने बा।। सनेही का नेही में दिगमिग बाअबले, नदी -ताल,झरना ,धरा सामने बा । सजल बाटेआकाश पाताल पग-पग , सजी प्रीत के ई छटा सामने बा । बहुत चाँन-सूरुज सितारा बा झिलमिल, दया, याचना बा , दुआ सामने बा । सकल खेल नेहिया के बाटे जगत में, जहाँ देखीं जब आईना सामने बा । कहीं लैला मजनू-कहीं हीर-राँझा, पढ़ीं कृष्ण जी के कथा सामने बा । गुलाबो में,चंदन में,केसर में जौहर, जहाँ रूप देखीं ,तहाँ सामने बा ।

गजल

बदलते मौसमों की शोख़ियाँ कुछ और कहती हैं। गरजते बादलों से बिजलियाँ कुछ और कहती हैं।। हमारे मुल्क का दस्तूर आज़ादी का हामिल है, मगर सँच कहने पर पाबंदियाँ कुछ और कहती हैं। हमारा बाग़बाँ कहता है हरियाली है गुलशन में, चमन की सूखी-सूखी पत्तियाँ कुछ और कहती हैं । बहुत ख़ुशहाल हैं अहले वतन मीडिया बताता है, बिलखतीं उजड़ी-उजड़ी बस्तियाँ कुछ और कहती हैं। कहाँ है अमन का भारत,कहाँ है चैन का भारत? चलो ढ़ूंढ़ें यहाँ महरूमियाँ कुछ और कहती हैं । जहाँ नारी सुरक्षा की है बजती डुग-डुगी जौहर, वहाँ अब बेटियों की सिसकियाँ कुछ और कहती हैं।

गजल

खेलत चाँन झिझरी बा,सनकल हवा बा। अँजोरिया में सइयम के बाते कहाँ बा ।। भिंगावत, जरावत वा सावन अनाड़ी , सनेहिया का नेहिया के गजबे दशा बा। लहर गिनला से कहिया सपना पुराला, नदी काटे मुस्की गुलाबी छटा बा। कबो कवनो धोखा नाअपनन से धारे, सभे जानेला ई त सबका पता बा । देखाईं चलीं आके अपना से कतहीं, कवन रोग बा कवन जानी दवा बा बिना मरले -मिटले ना जौहर जी भेंटी, कठीन साँच के ,साध बा साधना बा ।

ग़ज़ल

सज़ा तुम जो चाहो मुझे वह सज़ा दो। मगर पहले मेरी ख़ता तो बता दाे।। जहाँ आग है नफरतों की बुझा दो। चलो आज शम्मये मुहब्बत जला दो।। मेरे दिल पे सोज़े वफा लिखने वाले, कभी दर्दे दिल की भी मेरी दवा दो। ये माना मुहब्बत -एबादत है लेकिन, मेज़ाजी अगर है तो दिल से भूला दो। सियासत के भडुँओं ने नफरत है बोया, उठो चाल इनकी जहाँ को बता दो। ज़बाँ अब नहीं सर कटाना पड़ेगा, मगर सँच को तुम अब सभी को बता दो। यही ज़िंदगानी का मक़सद है जौहर, "दिलों पे मुहब्बत का सावन लूटा दो।"

गजल

कहियो लउकित कहीं,जिनगी जे चमेली बन के। हम उठा लेतीं , हथेली प हथेली बनके के।। भाग देखीं कबो आइल, त ऊ अइसन आइल, जिन्दगी भर रहल एक साथ पहेली बन के । प्रीति के रीत अनाड़ी ना निभावे जाने , संगे-संगे का रहित, साँच सहेली बन के । भाग जूही के आ बेला के गुलाबी मौसम , हमरा बखरा में रहल, दर्द हवेली बन के । रूप दर्पण में कहाँ, नेह के जौहर भेंटी , लाख फुसलावे कहे, रोज बहेली बन के ।

गजल

बदलते मौसमों की शोख़ियाँ कुछ और कहती हैं। गरजते बादलों से बिजलियाँ कुछ और कहती हैं।। हमारे मुल्क का दस्तूर आज़ादी का हामिल है, मगर सँच कहने पर पाबंदियाँ कुछ और कहती हैं। हमारा बाग़बाँ कहता है हरियाली है गुलशन में, चमन की सूखी-सूखी पत्तियाँ कुछ और कहती हैं । बहुत ख़ुशहाल हैं अहले वतन मीडिया बताता है, बिलखतीं उजड़ी-उजड़ी बस्तियाँ कुछ और कहती हैं। कहाँ है अमन का भारत,कहाँ है चैन का भारत? चलो ढ़ूंढ़ें यहाँ महरूमियाँ कुछ और कहती हैं । जहाँ नारी सुरक्षा की है बजती डुग-डुगी जौहर, वहाँ अब बेटियों की सिसकियाँ कुछ और कहती हैं।

गजल

खेलत चाँन झिझरी बा,सनकल हवा बा। अँजोरिया में सइयम के बाते कहाँ बा ।। भिंगावत, जरावत वा सावन अनाड़ी , सनेहिया का नेहिया के गजबे दशा बा। लहर गिनला से कहिया सपना पुराला, नदी काटे मुस्की गुलाबी छटा बा। कबो कवनो धोखा नाअपनन से धारे, सभे जानेला ई त सबका पता बा । देखाईं चलीं आके अपना से कतहीं, कवन रोग बा कवन जानी दवा बा बिना मरले -मिटले ना जौहर जी भेंटी, कठीन साँच के ,साध बा साधना बा ।

ग़ज़ल

सज़ा तुम जो चाहो मुझे वह सज़ा दो। मगर पहले मेरी ख़ता तो बता दाे।। जहाँ आग है नफरतों की बुझा दो। चलो आज शम्मये मुहब्बत जला दो।। मेरे दिल पे सोज़े वफा लिखने वाले, कभी दर्दे दिल की भी मेरी दवा दो। ये माना मुहब्बत -एबादत है लेकिन, मेज़ाजी अगर है तो दिल से भूला दो। सियासत के भडुँओं ने नफरत है बोया, उठो चाल इनकी जहाँ को बता दो। ज़बाँ अब नहीं सर कटाना पड़ेगा, मगर सँच को तुम अब सभी को बता दो। यही ज़िंदगानी का मक़सद है जौहर, "दिलों पे मुहब्बत का सावन लूटा दो।"

गजल

कहियो लउकित कहीं,जिनगी जे चमेली बन के। हम उठा लेतीं , हथेली प हथेली बनके के।। भाग देखीं कबो आइल, त ऊ अइसन आइल, जिन्दगी भर रहल एक साथ पहेली बन के । प्रीति के रीत अनाड़ी ना निभावे जाने , संगे-संगे का रहित, साँच सहेली बन के । भाग जूही के आ बेला के गुलाबी मौसम , हमरा बखरा में रहल, दर्द हवेली बन के । रूप दर्पण में कहाँ, नेह के जौहर भेंटी , लाख फुसलावे कहे, रोज बहेली बन के ।

गजल

सड़ गइल पानी नदी के,के कही। साँच ई नइकी सदी के,के कही ।। हाँ कही, डट के सजी जनता कही, तब समय के चौहदी के, के कही । आज के ई खेल सारा देख के, बात अब नेकी-बदी के,के कही। नाम पर मजहब-धरम के गेम बा, भेद ई लादा-लदी के, के कही । बन गइल लबरा - चलीसा राज, झूठ खनदानी जदी के,के कही। बस इहे जौहर दशा बा देश के, अब सुदी के आ बदी के,के कही।

भोजपुरी शेर

प्रश्न उठ्ठी ना उठ्ठी चीँख के उत्तर बोली । तोप का मुँह पर कहिया ले कबूतर बोली।। (जौहर शफियाबादी)

गजल

प्रशन ऊठी ना ऊठी चीँख के उत्तर बोली। तोप का मुँह पर कहिया ले कबूतर बोली ।। मौसमन का छाँह में ठहरल बाअब गंगाके जल, रउवे सोचीं भला,कहिया ले पवित्तर बोली । बीच गंगा में तपा जे, बदन आइल बा, टूट के बोले त बोले दीं, बेहतर बोली । रात आँखे में कटेले, सुनी रउवे किरिये, पढ़के चिठ्ठी में सुनब,रउवो भीतर बोली। लोगो पढ़ि़ -पढ़ि के जरावे के जतन में बा अब, गाँवो विराना बनी त्रिया चरितर बोली । धर्मो के नामो प जे लोग लड़वावेला, कइसे ई जौहर कहस देवता पितर बोली।

गजल

शांति कहवाँ कवनो ठिकाना प बा । आदमी-आदमी के निशाना प बा ।। जेबा ऊपरे-ऊपर मुंहपुरावन करत, भीतरे- भीतरे आना- काना प बा । दाँत -काटल जे रोटी रहे खात ऊ, दिन बिगड़ला प देखीं बहाना प बा। सामने बाहुबल के, का कानून के, ए0के0छप्पन लिखाइल जमाना प बा ई गजल -गीत जिनिगी के जौहर इहाँ, दर्द फइलल सजी पाना-पाना प बा ।

भोजपुरी शेर

हर साँस के लिबास रंगल बा फरेब से, अपना के अपने देखीं मुखौटा उतार के । (जौहर शफियाबादी)

गजल

दर्द छाती के जे अँखियन में सजवले होई । प्रेम के गावँ में ,ऊ आग लगवले होई ।। भर गइल होई मुहब्बत के गगरिया अचके, जब केहू याद $ का पनघट से उठवले होई । प्रीत के रीत मुहब्बत के चलन झलकत बा, नाम हमरो केहू ,उनका से बतवले होई । आ रहल बा जे गमक याद का कान्हे चढ़के, केहू केसर नू कहीं जिनगी के छुपवले होई । तोहरा लिलरा से जे जौहर लहू टपकत बा, होई अपने केहू ,पत्थर जे चलवले होई ।

गजल

बाझन के बा गोल सुगनवा । अपनोअँखिया खोल सुगनवा ।। केकर गोड़ लहू में भींजल, कवन भइल बे मोल सुगनवा । बरखा हंस-हंस के बहसत बा, अपनो पर के तौल सुगनवा । रूप नदी से भर के ले आ, आँखिन के नव डोल सुगनवा । कौन खरीदी जौहर के अब , ई बाटे बे - मोल सुगनवा ।

गजल

एह तरे बा समय बेवफा हो गइल । हाल जिनगी के बहुते बुरा हो गइल ।। चाँद हमरा पहुँच के नू बाहर रहे, रउवा मुठ्ठी के का ई दशा हो गइल । आज हर मोड़ पर भूख बा प्यास बा, गाँव जइसे बा अब कर्बला हो गइल । जेके पूजे में सउँसे सिराइल उमिर, आज उहो बा देखीं खफा हो गइल । हम जे रमनी ए जौहर गजल-गीत में, लोग निहँसे लागल बावला हो गइल ।

गजल

प्रीत के चौसर के खेलल बा,इहो खेल$उचारे नाक। दिल के बाजी मात पड़े तब,जान के बाजी झट हारे नाक।। कर्म के चातुर,नेह के अातुर,कइसन-कइसन भइलें सब वीर, अइसन लाल कहाँ दुनिया में,जइसन यार हमारे नाक। छलनी-छलनी हियरा-जियरा टुक -टुक छाती-बाती पर, वार सहे मुदई के ,मारे, उठ - गिर के ललकारे नाक। ओकरे पथ पर आँख बिछाईं, चढ़ा-चढ़ा पूजा के फूल, देश के नइया जेे मर-मिट के, आके पार उतारे नाक। मिल-जुल के दिन चार बिताईं, दूर भगाईं स्वारथ के, जौहर जी सब लोभ के लफरा,आज भरम के बारे नाक।

गजल

दरद जिन्दगी के सजा देले बानी। हँसी उम्र भर के भुला देले बानी ।। बा, हमरा लकम चोट खाये सहे के, हथेली से तितली उड़ा देले बानी । कहाँ कवनो इंसान लउकत बा सोझा, नजर से त पर्दा हटा देले बानी । बड़ा रंग बा भोजपुरियो गजल में, दिया साधना के जरा देले बानी । घटा, फूल, पनघट बसंती हवा में, कजरवा के बदरा बना देले बानी । बुता देला जे आग मन के ऐ जौहर , उहे आग दिल में लगा देले बानी ।

गजल

नया-नवतुन रसीली का कहीं। घटा उमकल हठीली का कहीं।। कहीं कलकत्ता -दिल्ली का कहीं। भइल माचिस के तिल्ली का कहीं ।। उहाँ का साँच के चर्चा करीं, जहाँ बा कठदलीली का कहीं । लड़ाई में पड़ल धरमो-करम, हंसत बा पिल्ला-पिल्ली का हीं। रोवत बा इतिहास समय के देखीं, स्वारथ छैल - छबिली का कहीं । घरो बाँची का नेह के जौहर अब, ना सहतीर-ना बल्ली का कहीं ।

गजल

शांति कहवाँ कवनो ठिकाना प बा। आदमी-आदमी के निशाना प बा ।। जे बा उपर -उपर मुंहपुरावन करत, भीतरे-भीतरे आना - काना प बा । दांत काटल जे रोटी रहे खात ऊ, दिन बिगड़ला प देखीं बहाना प बा। सामने बाहुबल के , का कानून के, ए, के,छप्पन लिखाइल जमाना प बा। ई गजल- गीत जिनिगी के जौहर इहाँ, दर्द फइलल सजी पाना-पाना प बा,

सावनी- गीत

सावन में जब ना घर सइयाँ, बजर पड़ो ओही सावन में । तड़पी-तड़पी बदरा तड़पावे, रातS कटे निज नयनन में ।। सावन में,,, हे सखी सावन अधिक सोहावन, कहत$ननदिया पावन-पावन । हिलत$हिलोर हिया हुक उठे, बिन मोहन के मधुवन में ।। सावन में,,, उमड़ि - घुमरी बदरा नित आवे , कसों कहीं कइसे तरसावे । जल-थल,जल-थलअँगना-दुआरा, आग लगे मोरे चितवन में ।। सावन में,,, श्याम बिना सुख सार गइल बा, सूना सब संसार भइल बा । सब सखी मेंहदी हाथ रचा के, निरखी कहत कुछ कानन में।। सावन में,,, ना सइयाँ से अब हम बोलब, अडिग रहब तनिको ना डोलब। वैरागी जौहर का जानस, चढ़ल घटा रूत सावन में ।। सावन में जब ना घर सइयाँ, बजर पड़ो ओही सावन में ।

गजल

दाग धोवत रहीं गम छुपावत रहीं। लाज नेहिया केअपना बचावत रहीं।। पी के आँसू जिये में बड़ा बा मजा, चोट खाके गजल-गीत गावत रहीं । फूल पर देखीं भँवरा के मुर्छित-मगन, जोग जिनगी के जानी जोगावत रहीं । होश में जन पड़ीं , रोश में जोश में, ज्योत नेहिया के अपना जगावत रहीं। हाथ पर लिख के नेहिया जे मिटका गइल, हाथ ओकरे से हम हूँ, देखावत रहीं । सुन के अनकर कथा आँख जौहर भरल, आग मनवा के मन में दबावत रहीं ।

गजल

अखबारी झकझोर खबर बा, हमहूँ सोंचीं तुहूँ सोंचs । मानवता के क्षय के डर बा, हमहूँ सोंची तुहूँ सोंचs ।। आकुल नयन बेचैन अधर बा, हमहूँ सोंची तुहूँ सोंच । सारा सपना एहर-ओहर बा, हमहूँ सोंची तुहूँ सोंचs ।। सुना पंघट गाँव नगर बा, हमहूँ सोंची तुहूँ सोंच । जीवन कतना टेढ़ डगर बा, हमहूँ सोंची तुहूँ सोंचs ।। काँच के हमरो-तहरो घर बा, हमहूँ सोंची तुहूँ सोंचs हाथ में हमरो-तहरो पत्थर बा, हमहूँ सोंची तुहूँ सोंचs ।। सत्ता के बेमोल लड़ाई, उलझल बारें भाई-भाई । खतरा सबतर आठो पहर बा, हमहूँ सोंची तुहूँ सोंचs ।। मज़हब धर्म में झगड़ा कइसन? मानवता में रगड़ा कइसन । स्वारथ सब झगड़ा के जड़ बा, हमहूँ सोंची तुहूँ सोंचs ।। अंधा नगरी चौपट राजा, जस भाजी तस बाटे खाजा । सच्चाई कहवाँ जौहर बा, हमहूँ सोंची तुहूँ सोंचs ।।

ग़ज़ल

अजब अंदाज़ से मैंने गुज़ारी जिंदगी अपनी। किसी के नक़्शेपा पर रखदिया सारी ख़ुशी अपनी।। शऊ रे - ज़िंदगी में ,मैं चेराग़े-राहे मंज़िल हूँ , किसी की इत्तबा को जानता हूँ बंदगी अपनी। ख़ुदा ख़ुद में तलाशूँ या के मंदिर और मस्जिद में, कहो शैख़ो - ब्रह्मण से बचायें आस्तीं अपनी। अमीरी और ग़रीबी का है हंगामा जहाँ हर पल, क़नाअत सब्रे सादिक़ है बहारे ज़िंदगी अपनी। मुझे पहचान ना आसाँ नहीं ऐ तालिबे दुनिया, ख़ूदी में भी झलक जाती हैअकसर बेख़ुदीअपनी। मुझे लेने फरिश्ते जिस घड़ी आयेंगे चुपके से, सहम जाएंगे जब देखेंगे शाने दिलबरी अपनी। कफन में मुंह छुपा कर मेरी मैयत जा नहीं सकती, मुझे मालूम है जाने न देगीआशक़ी अपनी। हेसारे अक़लो -दानिश में नहीं है इश्क़ का जौहर, ज़माने भर में बिखड़ेगी,किसी दिन रौशनी अपनी।

गजल

आदमी- आदमी में होखेला। दर्द कुछ जिन्दगी में होखेला।। प्रीत के रीत ई बातावेला, बात कुछ दिल्लगी में होखेला। रूप के धूप कुछ निखरे अउरी, नेह जब चाँदनी में होखेला । कुछ त समुझे के अब जतन$जानीं, कुछ त नेकी - बदी में होखेला । रूप का धाह से जर जाई सब, धार उमड़ल नदी में होखेला । जाके सीखीं ना रउवो जौहर से, बात जे सादगी में होखेला ।

गजल

लोग उठाली हाथे-हाथ। दान-दया जो राखे हाथ।। हाथ यश अपजश के साथी, केकरा नइखे पाले हाथ । जेकरा पाले ग्यान -गदा, उहे सेन्ह में डाले हाथ । समय -दशा के साथ चलीं, रोज समइया मारे हाथ । कर्म -कथा गीता के ग्यान, जन-जन माथे राखे हाथ । जौहर कारिख का घर में, आके साफ बचाले हाथ।

गजल

जो शहेदीं पे दिल से फिदा होगए। राज़दारे फना व बक़ा होगए।। जोभी सरवर के दर के गदा होगए। दोनो आलम के फरमारवा होगए।। लज़्ज़ते ज़िक्रे सरकार मत पूछिए , वसवसे क़लब के सब हवा होगए। बीच तूफाँ में नाम आपका लेलिया, मौजे- गिरदाब हम से जुदा होगा । पाएअक़दस पे रखदी जोअपनी जबीँ, जितने सजदे क़ज़ा थे अदा होगए । जब से उनकी निगाहे - एनायत हुई, देखते-देखते क्या से क्या होगए । नात-गोई ने जौहर नवाज़ा तुझे, थे ख़ज़फ गौहरे बे बहा होगए।

गजल

आवे दीं आवे जे दुनिया में कहर आवेला । हमरा हर हाल में जीये के हुनर आवेला ।। घर से पहिले कबो रस्ता में नगर आवेला। तब कहीं जाके अबग-खास के घर आवेला । जब कबो सोंच के उड़ेला पताका ऊपर, भाव आकाश से धरती प उतर आवेला । पहिले-पहिले त समुन्दर के सतह थिरकेला, तब कहीं जाइके भूचाल भवँर आवेला । आज के जुग में का अरमान तमन्ना-इच्छा, होला कुछ अउर आ कुछ अउर नजर आवेला । छोड़ीं जौहर के बुझाइत त इहे हाल रहित, इनका बस नामें खुदा आठो पहर आवेला ।

गीत

सीतली बेयरिया ह अंचरा के छईयाँ । गिनाई दुख आपन कवन-कवन सइयाँ ।। अँखिया में जादू कजरिया में टोना, हमरा ना आवे करे कवनो चोन्हा । बिरहा के मातल रहब एही ठइयाँ, गिनाई दुख........................ । गउवाँ नगर छुटल बाबा अँगनइयाँ, सखिया सलेहरी आ सब पहुनइयाँ । चढ़ली जवनिया के रूत अंगरइयाँ, गिनाई दुख................... । जनी जा विदेश सइयाँ घरही में रहs, मिली-जुली दुखs सुखs संगे-संगे सहs । चहकी अंगनवा में अपनो चिरइया, गिनाई दुख .................... । शहरs के ओरी का बढ़ावेलs पउवाँ, ओकरो से निक बाटे देखs आपन गउवाँ । खेत खरिहनिया में बाजे शहनइयाँ, गिनाई दुख..................... ।

गजल

अन्हरिया बा भरल भीतर,कहीं बाहर कहाँ बाटे। दुरंगी आदमी बा आज के , सादर कहाँ बाटे। बा धइले स्वर्ग आ जन्नत,पुजारी के निमाजी के, गजब लालच के चक्कर बा,केहू उपर कहाँ बाटे। कटाई जीभ एकरो, साँच बोलत बा इहो अब त$, पता लीं गाँव के एकरा, बताईं घर कहाँ बाटे। बड़ा हलचल-बड़ा चंचल सतह पर बा मुखर पानी, नदी भादो के उफनत ई भला सागर कहाँ बाटे । सभे कर्बल कथा बाँचत,सुनावत बा महाभारत, मरद में अब कहीं मरदानगी जौहर कहाँ बाटे।

गजल

सचमुच रहे त संच क सिवा का लिखल गइल । बखरा में हमरा जुर्म-सजा का लिखल गइल ।। हम बानी गाछ ऊ कि ना पत्ता, ना फूल बा । तब हमरे नामे कारी घटा का लिखल गइल ।। के दूध के धुला बा सियासत के गाँव में । झूठे के चारू ओर हवा का लिखल गइल ।। इतिहास आ भूगोल त हमनी बनाई ले । रउवा समय के साँच कथा का लिखल गइल । विद्वान के कलम अब बिकाता बाजार में । बिगड़ल बा चारूओर दशा का लिखल गइल ।। जौहर जी न्याय मोल बा सपना भइल इहाँ । कइसन कहाला धर्म-दया का लिखल गइल ।।

गजल

प्रेम-लता के नेह -कला में,स्रधा के ह$गंगा नाच। बाकी सियासत के दंगल में,होखत बाटे नंगा नाच।। शंकराचार्य-इमाम बुखारी, के निमन बा, के हत्यार। धरम भइल स्वारथ के पार्टी, सत्ता के मुंहमंगा नाच।। रउओआईं झांक के देखलीं,आकीं का बाटे अहवाल। ठुनकत बा, इतिहास समय के,माँगत बाटे नंगा नाच।। का लइकन के बात सिखाएब,आउर बताएब हम इतिहास। चिंता से माथा बा ठनकत,का होई बेरंगा नाच।। स्वारथ के अंहरी नगरी में,हर गगरी में जहर भरल। जौहर के पत रंगमहल में,होखत बा अधरंगा नाच।।

गजल

उफनत किनार$धार$नदी के चढ़ाव पर। ओह पार केभरोस का कागज के नाव पर।। एह मतलबी सामाज$से आशा ई जन$करीं, मलहम केहू लगाई अब जिनिगिया के धाव$पर, अब शांति के,के इहाँ गीत आ कथा-गजल सुनी, मन आ मिजाज$आज$बाटे सभकर तनाव पर। मजहब-धरम के नेत$ के ईमान$के मरी के, खुश बा उहे ,जे बेचत बा ,बाजार भाव पर। रचना धरम के मोल$ जे देखीं उहे रचीं बस, जन रोक दीं कलम के ,केहू का दबाव पर । जौहर जी अबहूँ चेत$लीं जन साँच$ कुछ$ कहीं, सबकर निगाह बाटे अब त$रउवे पड़ाव पर ।

गजल

जिनगी के नाम$का ह बताई ले घाम-छाँह । पाइंले घाम -छाँह ओसाइले घाम-छाँह ।। कहियो समय केहू के कबो माफ$ ना करेला, हमहूँ दशा- दिशा के जोगाइले घाम$-छाँह।। जातो- धरम के नाम$ पर सस्ता बिकात बाटे, भोगी ले, हम ना बेंची- भजाइले घाम-छाँह । हमरो उमीर बा, पूस$के दिन फूस$के भइल, छाईंले घाम$ - छाँह जोगाइले घाम- छाँह । जौहर समय सामाज$ से हमरा जे मिलल बा, अपना गजल में ऊहे सजाईले घाम-छाँह ।

गजल

तहरो अँखियन के मर गइल पानी। सुन के अँखियन में भर गइल पानी।। लोर$के मोल का उनुका सोझा, आके अँखियन में डर गइल पानी। नरक$ नाला -नदी रहे बाकिर, जाके गंगा में तर गइल पानी । धर्म $ के नाम पर लड़ाई बा, लाज$से गिर के गड़ गइल पानी। दान$ अँजुरी से करके लवटल जे, ओकरा अँजुरी में भर गइल पानी । मोल मोती के का रहल जौहर, जहिया ओकर उतर गइल पानी ।

गजल

आदमी -आदमी में होखेला । दर्द कुछ जिन्दगी में होखेला।। प्रीत के रीत ई बातावेला, बात कुछ दिल्लगी में होखेला। रूप के धूप तबअउरी निखरे, नेह जब चाँदनी में होखेला । कुछ त समुझे केअब जतन$जानीं, कुछ त नेकी - बदी में होखेला । रूप का धाह से जर जाई सब, धार उमरल नदी में होखेला । जाके सीखीं ना रउवो जौहर से, बात जे सादगी में होखेला ।

गजल

हाथ में फूल बा ना पत्थर बा । गाँव में तब का आजो हलचल बा।। केहू आपन ना केहू बेगाना, शहर में आदमी के जंगल बा । हम अकेला खड़ा उहाँ बानी अब, आगे- पीछे जहाँ से दल-दल बा। हमरा संदेह बा मिलावट के, लोर घड़ियाली बा कि निर्मल बा। आवेवाला समय कही सब जौहर, आज कतना समाज बगदल बा ।

गजल

जेकरा मन में प्यास रहेला । ओकरे नू कुछ आस रहेला ।। ऊ दूसरा के हीन ना समुझे, जेकरा में कुछ खास रहेला । देखेला सब लोग ओही के, जे हर जन के पास रहेला । सारा जग अपने जस लागे, जब मन में विश्वास रहेला । जहवाँ नेह-दया,करुणा बा, उहवें जौहर दास रहेला ।

गजल

ज़िंदगी के आईने में,यार की तस्वीर है। आईना दर आईना है,ये मेरी तक़दीर है।। उनसे मिलने की तमन्ना,डस रही है रात-दिन, पाँव में हैं बेड़ियां तो, हाथों में ज़ंजीर है । मैं पपीहे की तरह, एक बुंद को तरसा किया, ख़्वाब है इश्क़ो-वफा ,ये ख़्वाब की ताबीर है। देखने वाले समझते हैं,कि मैं ख़ुश हूँ मगर, दर्दे दिल अब मेरे हिस्से की बनी जागीर है । हँसते इन चेहरों के भीतर, टूटे हैं दर्पण कई, झाँक कर देखे कोई, कितने ग़मों की भीर है। प्यार की पहली किरण नें,इस क़दर तोड़ा मुझे, पूछता फिरता हूँ क्या, इस दर्द की तदबीर है। प्यार का सपना है अपना,प्यार है जौहर मगर, एक लटकती सी हमारे, सामने शमशीर है

गजल

नया-नवतुन रसीली का कहीं। घटा उमकल हठीली का कहीं।। कहीं कलकत्ता -दिल्ली का कहीं। भइल माचिस के तिल्ली का कहीं ।। उहाँ का साँच के चर्चा करीं, जहाँ बा कठदलीली का कहीं । लड़ाई में पड़ल धरमो-करम, हंसत बा पिल्ला-पिल्ली का हीं। रोवत बा इतिहास समय के देखीं, स्वारथ छैल - छबिली का कहीं । घरो बाँची का नेह के जौहर अब, ना सहतीर-ना बल्ली का कहीं ।

गजल

शांति कहवाँ कवनो ठिकाना प बा। आदमी-आदमी के निशाना प बा ।। जे बा उपर -उपर मुंहपुरावन करत, भीतरे-भीतरे आना - काना प बा । दांत काटल जे रोटी रहे खात ऊ, दिन बिगड़ला प देखीं बहाना प बा। सामने बाहुबल के , का कानून के, ए, के,छप्पन लिखाइल जमाना प बा। ई गजल- गीत जिनिगी के जौहर इहाँ, दर्द फइलल सजी पाना-पाना प बा,

गजल

दिन के बिलखे दीं सुरजा के रो जाएदीं। रात - सावन के सपना में खो जाएदीं।। नेह का हाथ में आस के चाँन बा , दाग लागल चुनरिया के धो जाए दीं। याद के रउवे बदरा बा मेड़रा रहल, मन के अँचरा के हमरा भिगो जाएदीं। दर्द लइकन सा जिद्दी बा,हम का करीं, रउवा थपकीं ना कुछ देर सो जाएदीं। कवनो घटना खबर देके ना आवे ले , जे-जे होखत अचानक बा हो जाएदीं। ई फसल लहलहाई चढ़ल जेठ में, बीज कागज प जौहर के बो जाएदीं।

गजल

चुपके-चुपके प्यार के दिअना जरा के देख लीं । आस के तुलसी कबो, मन में लगा के देख लीं ।। ई जवानी ई उमर, केकर रहल बा जे रही । तार बीणा के बचा के, कुछ बजा के देख लीं ।। शब्द अक्षर में कबो ऊ, दर्द ना उतरी हजूर । प्रेम में जे दर्द बा, ऊ आजमा के देख लीं ।। हाट में बा रूप के, तितली कमल भौंरा के मोल । आँक लीं जिनगी के अब, पर्दा उठा के देख लीं ।। भाग में केकरा बा जूही, बेला आ चम्पा गुलाब । हाथ के रेखा चलीं, रउवो देखा के देख लीं ।। आज बा सगरो भरम के, बोल-बाला गाँव में । कुछ हटा के, कुछ बचा के, कुछ लुटा के देख लीं ।। गाँव में अन्हरन के जौहर, के किनी दर्पण भला । पग तनी रउवे बढ़ा के, कद घटा के देख लीं ।।

गजल

चाल देशी ना आइल शहर में नजर। बा बनावट के कतना शहर में असर।। गाँव के छोड़ के हम त अइलीं शहर। का मिलल,बस किराया के दमघोंटू घर।। रउरा मिलला से हमरा पता ई चलल। खुद से कतना भइल बा शहर बेखबर।। सादगी, प्रेम, सरधा, दया आ छमा। ना बा गुण कवनो,ना बा शहर का हुनर।। गाँव के प्यार जौहर ना दिल से गइल। लाख काटे ,के कटनीं शहर में उमर ।।

गजल

अँजुरी से बाँट$-बाँट$ के सब के बाहार हम। पतझड़ में रह के देखी ले,जग के श्रृंगार हम।। पग-पग भइल ह$ग्यान ,तजुर्बा नया भइल । मुदई प जब से कइनी हाँ,कुछ एतबार हम।। हमरा हिया में सारा,जगत्तर समा गइल । हो गइनी टूक$-टूक ,भले तार-तार हम ।। रउवा समय सामाज का चोला के दम भरीं। कहिये ना फेंक$ देनी हम,मुखौटा उतार के।। बा,धारदार$ दुनिया,गुलामी के छाँव में ई । तूड़े के आज$आईं,अब लगाईं जोगाड़ हम।। जौहर भ्रम कहेला,आ केहू अस्ता कहत बा। मुँह देख के कहीं ना, जोगाईं सुतार$ हम$।।

गजल

बाझन के बा गोल सुगनवा। अपनोअँखिया खोल सुगनवा।। केकर गोड़ लहू में भीजल । कौन भइल बे मोल सुगनवा।। बरखा हंस-हंस के बहसत बा। अपनो पर के तौल सुगनवा ।। रूप नदी से भर के ले आ । आँखिन के नव डोल सुगनवा।। कौन खरीदी जौहर जी अब । तू बारे अनमोल सुगनवा ।।

गजल

अद्भुत गुलाबी रूप के, पड़तर करी चन्दा कहाँ । बा पद्मिनी श्रृंगार के, दूसर कहीं उपमा कहाँ ।। उनका लुकाए भागे के, कइसन गरज अचके पड़ल । मानल गइल बा प्रीत में, नखड़ा कहाँ, परदा कहाँ ।। घाती ह्रदय से हीन का, जानी पराई पीड़ के । हs दर्द खाली दर्द बस, बसिया कहाँ, टटका कहाँ ।। अब प्रेम के मीरा कहीं, राधा कहीं, कान्हा कहीं । बा नेह में देखल गइल, करिया कहाँ, गोरा कहाँ ।। बस देख के उपरे-उपर, खेलत हँसत बुझत बा लोग । ई दर्द बा कहवाँ बताईं, होत बा चरचा कहाँ ।। अब साँच में का आँच जौहर, का कहीं सपना भइल । उनका काँती रूप के, कतहूँ मिलत चेहरा कहाँ ।।

गजल

हमरा सब चल गइल बा पता। ई उड़ावल ह , केकर हवा ।। रउवे किरिये कहीं, देखलीं । आ के सावन के उमड़ल घटा।। धन बढ़ल ठीक ह$ मन के न। रउवा अतने में गइनीं दहा ।। चान के मोल माटी भइल । अपने बाँची ले बाँची कथा ।। बात तारा के पन्दरोह में । कइसे लिख दीं बताईं भला।। साँच से लाभ केकर भइल । हित-मुदई सभे बा खफा ।। बाटे जौहर मरद बस उहे । नेह के जे जमावे जवा।।

गजल

उहो नाज-नखरा, दुलारs के,दिन याद बाटे तनी-तनी । सजी लाग बाझs श्रृँगारs के,दिन याद बाटे तनी-तनी ।। ऊ बसंतsकोइल फाग के,ऊ निठाहs टीसs के राग के । ऊ श्रृंगार गांवs के,यारs के,दिन याद बाटे तनी-तनी ।। कबो आके चमकल छुप गइल,कबो बात-बात में रूस गइल । सजी भाव भेषsकुँआरsके,दिन याद बाटे तनी-तनी ।। कबो आके पूछत घातsके,कबो जाके रोवल रात के सब । ऊ बहार कँगना कटारs के,दिन याद बाटे तनी-तनी ।। जवानी खेतs का हाथs पर, ऊ श्रृंगार सागs के माथ पर । उहो पुरूवा-पछुआ बयारs के,दिन याद बाटे तनी-तनी ।। गजल के जौहर गीत के,ऊ पहिल-पहिल छवि मीत के सकल। सजी अपना उनका करारs के, दिन याद बाटे तनी-तनी ।।

गजल

नदी के धार जे मरुथल का ओरी मोड़ देबेला । उहे तरसत धरा के जल से नाता जोड़ देबेला।। हिमालय के टपे के लगन जेकरा के बढ़ावेला, ऊ चिंता गोड़ पीरइला के पीछे छोड़ देबेला। भरम बाँचल बा ओकरे दम से नेहिया के जगत्तर में, जे दू टूटल सनेही दिल के देखत जोड़ देबेला । कबो ऊ यात्रा के यातना से ना डरे राही, जे चलते-चलते फोड़ा गोड़ के सब फोड़ देबेला। कबो दुनिया भला ओकरा के कहियो ना कही जौहर, तनी सा बात पर जे कर के वादा तोड़ देबेला।

गजल

लैला के मजनू, हीर के, राँझा के लाग-बाझ। बाजत मजीर ढोल बा,कान्हा के लाग-बाझ।। सोहनी के प्रीत-रीत, महीवाल के अबूझ, एक-एक चिराग नेह के,नाता के लाग-बाझ। जिनगी के नेह-छोह के, फरहाद यार के , अपना सबूरी,साधना,श्रध्दा के लाग-बाझ। जुलियट के रोमियो केआ खुसरो निज़ाम के, दमयन्ति,अम्रपाली के, अरजा के लाग-बाझ । जौहर गजल का गाँव में, चिंतन श्रृंगार के, तुलसी ,कबीर, जायसी, मीरा के लाग-बाझ।

गजल

सुगबुगी होजूर बाटे। बात कुछ जरूर$बाटे।। रउवा त$महान बानी , हमरे सब कसूर$बाटे। सब सिंगार जब हमरे बा, तहरा का गरूर $ बाटे। जिंदगी बा बोझ$भइल, हूह ना सहूर $ बाटे। बात जे ना दिल के बुझे, बड़का बेलूर$ बाटे । दिल त तोहरे पासे बा, घर हमार दूर$ बाटे । जिन्दगी त जौहर के अब, नूर - अल्ला , नूर बाटे ।

गजल

ज़िंदगी के आईने में,यार की तस्वीर है। आईना दर आईना है,ये मेरी तक़दीर है।। उनसे मिलने की तमन्ना,डस रही है रात-दिन, पाँव में हैं बेड़ियां तो, हाथो में जंज़ीर है । मैं पपीहे की तरह, एक बुंद को तरसा किया, ख़्वाब है इश्क़ो-वफा ,ये ख़्वाब की ताबीर है। देखने वाले समझते हैं,कि मैं ख़ुश हूँ मगर, दर्दे दिल अब मेरे हिस्से की बनी जागीर है । हँसते इन चेहरों के भीतर, टूटे हैं दर्पण कई, झाँक कर देखे कोई, कितने ग़मों की भीर है। प्यार की पहली किरण नें,इस क़दर तोड़ा मुझे, पूछता फिरता हूँ क्या, इस दर्द की तदबीर है। प्यार का सपना है अपना,प्यार है जौहर मगर, एक लटकती सी हमारे, सामने शमशीर है ।

गजल

हिया में हर दम हुलास राखीं,बनाईं बतिया मचल-मचल के। समुझ-समुझ के सँवर-सँवर के,विचार रखीं सम्हल-सम्हल के।। केहू के जूही,केहू बेला, केहू के चंपा के रंगs होला । खिले दीं ओकरा केअपना रंगsमें,कली के कुंठा मसल-मसल के ।। पुरान होला ना नेह कहियो,इहे पिरितिया के रीति होला । बता रहल बा दशा-दिशा के,नयन के मोती उबल-उबल के ।। असर बा अतना हिया के तल में,धरा के फूँकी, गगन के फूँकी । निकल रहल बा हमार आँसू,दरद के गंगा उछल-उछल के ।। केहू का जानी हिया के टीसल,समय के हारल, समय के जीतल । कहाँ के दबले बा भाव आपन,समय के लाते कुचल-कुचल के ।। हिया में जेकरा बा दर्द दाबल,जिया में जेकरा बा नेह जागल । गजल ऊ जौहर के सुन रहल बा,महल से बाहर निकल-निकल के ।।

ग़ज़ल

तेरी तस्वीर है, काली घटा है । मगर जो बात तुझमें है कहाँ है ? मुझे फरहाद की सारी कहानी, अभी भी याद है, पहले सुना है । तेरी यादों की चादर ओढ़ कर ये, शरारत पर तुली सनकी हवा है । जोनूने इश्क़ में समझा न मैंने, वफा कहते है किसको क्या जफा है । सवेरा क्या भला होगा जहाँ में, मेरी आँखों में जो सूरज छूपा है । निगाहे - यार में मैं हूँ ,बहुत है, यही जौहर मेरा अपना पता है ।

गजल

छछनत हिया सनेह के धउड़ल नदी-नदी। तोहमत समय के नाम प बा बेखदी-बदी।। कैंसर का वार्ड में पड़ल बा सुघर जवान । सुननी ह ओकरे नाम ह इक्कीसवीं सदी ।। घर सब पड़ोसियन के चन्द्रमा प चल गइल । हमनी उचारीं पत्रा विचारीं सुदी-बदी ।। नयका बिहान सोंच के सूरूज ना आ सकी । मजहब-धरम के आग बुताई ना अब जदी ।। लेबुल बदल के बाँटी सड़लका शराब के । मुदई नया समाज के बान्हत बा चौहदी ।। पोथी-पुरान साँच का आगू ना चल सकी । पढ़-लिख के लोग नाधे ए जौहर लदा-लदी ।।

गजल

हो गइल का से का देखते रह गइल। आँख फूटल लवा देखते रह गइल ।। चान गरहन से कहिया भला घट सकल। लोग बिगड़ल हवा देखते रह गइल ।। केहू सावन सजवले बा आठो पहर । केहू उमड़ल घटा देखते रह गइल ।। जोग-टोना भइल बे असर दर्द में । बैध आपन दवा देखते रह गइल ।। नेह उनकर पता, झप से हथिया लेलस । बुधिया आपन पता, देखते रह गइल ।। केहू जौहर जिनिगिया लुटा के जीयल । केहू आपन नफा ,देखते रह गइल ।

गजल

उम्र भलहीं मिलल, ज़िंदगी ना मिलल । खाली दिअना मिलल, रोशनी ना मिलल ।। खोजलीं काल्ह गाँवन में, शहरन में हम । लोग सगरी मिलल, आदमी ना मिलल ।। जहिया खेलल गइल तेज से सूर्य के । चाँद थहरा गइल, चाँदनी ना मिलल ।। लोग बा झूठ में, मोह में, काल में । हम का झोखीं कि हमरा खुशी ना मिलल ।। जब से जौहर फकीरी में मनवा रमल । ठाट अइसन कहीं राजसी ना मिलल ।।

गजल

चरचा में चारू ओर बा नारी के मोल-भाव। धोती के कुर्ता-कोट के साड़ी के मोल-भाव।। अब घट रहल बा रोज आके रउवो देखीं ना। मजहब-धरम के मुल्ला-पुजारी के मोल-भाव।। कुछ लोग अब बा जे कुकरमो के बूझत सुकर्म बा। अब हमरो गाँव में बाटे शिकारी के मोल-भाव।। मजहब-धरम से ऊँच ह मानव धरम के बात। अबले बा रउरा मन में नू कटारी के मोल-भाव।। जौहर समय के रूप आ दर्पण बा हाथ में जब। एक दिन जरूर लागी कबो अनाड़ी के मोल-भाव।।

गजल

जब चिंता में याद के देखनीं दर्पण,आधी रात के बाद । टूटल हमरा व्याकुल मन के बंधन,आधी रात के बाद ।। नींद गँवा के बैरी अँखिया,बस तारा चुपचाप गिने । चाँद से टक्कर जब-जब लेवे,गरहन आधी रात के बाद ।। सूना-सूना दर्द में डूबल,सजल प्रकृति के साज मिलल । तेज भइल तब हमरा मन के धड़कन,आधी रात के बाद ।। बेचैनी कमरा से बाहर,जब-जब टोके हमरा के । गैर के लागे नीजे आपन,आँगन आधी रात के बाद ।। दर्द के बदरा उमड़ल-घुमड़ल,गरजल हमरा आँखिन में । सपना से जब अकुताइल मन,साजन आधी रात के बाद ।। ध्यान के जौहर शीशमहल में,पसरल राग बिहाग जहाँ । टूट के बरिसल तब आँखिन से,सावन आधी रात के बाद ।।

गजल

जिन्दगी अजनबी पहेली हs। छन में मुदई छने पहेली ह s ।। हमरा आँखिन में आग के दरिया। लोग समुझे सभे चमेली हs।। जिन्दगी रन ह आ करम कुटिया। चंचली - मनचली बहेली हs।। केहू समुझल ना आज ले बाबू । जादू - टोना भरल पहेली ह S।। जिंदगी के बा साधना जौहर । हमरा तकदीर के हथेली हS।।

गजल

रो-रो के सनेहिया का पथ में, जे आस के सावन तक पहुँचल। ई दर्द उहे बस जानी जे, चितकार के चितवन तक पहुँचल।। के जीत गइल के हार गइल, के हार गइल के जीत गइल । निर्णय ई भइल जब ज्ञान मिथक, संकल्प के चंदन तक पहुँचल ।। मन हार गइल तन जीत गइल, तन जीत गइल मन हार गइल । जब नेह का सागर के पानी, विश्वास के आँगन तक पहुँचल ।। जब घोर अन्हरिया के पीड़ा, दुतकार गइल दुर्योंधन के । तब धर्म धरासाई हो के, टंकार के उपवन तक पहुँचल ।। हर साँस के बाटे ताजमहल, हर आस के कुरूक्षेत्र जहाँ । ओह गांव के हम संसार कहीं, जब साध के मधुवन तक पहुँचल ।। जौहर के महाभारत में खड़ा, विश्वास के अर्जुन साखी बा । कब भीष्म पितामह के शय्या, हुँकार के दर्पण तक पहुँचल ।।

गजल

बढ़त जात रोजे निर्बाध। थम्हत कहाँ बाटे अपराध।। जिनगी के ईहे दस्तूर । हर्ष कबो कबहूँ बिसमाध।। मरे चैन से देत कहवाँ । साधSमचवले बाटे नाध।। थाहो ना पावलआज तले। केहू उनकर हिया अगाध ।। इन्सानीयत रहे महफूजS। जौहर के बा अतने साधS।।

गजल

उखम से फूल के बा,करेजा लहक गइल। अँगना में हमराआस केअगनीभड़क गइल।। तातल लहू जे नेह का,दिल से टपक गइल। जिनगी के तब उदास,बगइचा गमक गइल।। आइल जे याद उनकर,हँसी होगइल हवा। छँटते कुहास चान, दरद के चमक गइल।। सन्मुख गुलाब देख के,का अनकहल कहीं। सँइतल रहे जे आँखी में,हमरा झलक गइल।। सुन्दर सनेह सगरी त, दिगमिग भइल रहे। आँखिए केआँचरा रहे,कतहींअँटक गइल।। पुछनी के ए तरास, समुन्दर से का मिली। मन लुसफुसा के जाये का,पहिले झनक गइल।। जौहर जी जस के तस बा,बचा के निबाह लीं। ना त$बड़ा सहज बा,चुनरिया मसक गइल।।

गजल

आवे दीं आवे जे दुनिया में कहर आवेला। हमरा हर हाल में ,जीये के हुनर आवेला ।। घर से पहिले कबो रस्ता में नगर आवेला । तब कहीं जाकेअबग-खास के घरआवेला।। जब कबो सोंच के उड़ेला पताका ऊपर । भाव आकाश से धरती प उतर आवेला ।। पहिले-पहिले त समुन्दर के सतह थिरकेला । तब कहीं जाइके भूचाल भवँर आवेला ।। आज के जुग में का अरमान तमन्ना-इच्छा । होला कुछअउरआ कुछअउर नजरआवेला ।। छोड़ी जौहर के बुझाइत त इहे हाल रहित । इनका बस नामें खुदा आठो पहर आवेला ।।

गजल

अल्ला मेहरबान हो गइल । गदहा पहलवान हो गइल।। सतुआ पीसान हो गइल । कतना सस्ता जान हो गइल।। आदमियत बा आदमी में अब। ईद$ के नू चान हो गइल ।। शिक्षा-दीक्षा आज काल्ह बा। बनिया के दुकान हो गइल ।। गुरु जी के होई सतनाम। बेटिया जवान होगइल।। बतवा ई जौहर जी के बा। सबका मुंह के पान हो गइल।।

गजल

हमरा सब चल गइल बा पता। ई उड़ावल ह , केकर हवा ।। रउवे किरिये कहीं, देखलीं । आ के सावन के उमड़ल घटा।। धन बढ़ल ठीक ह$ मन के न। रउवा अतने में गइनीं दहा ।। चान के मोल माटी भइल । अपने बाँची ले बाँची कथा ।। बात तारा के पन्दरोह में । कइसे लिख दीं बताईं भला।। साँच से लाभ केकर भइल । हित-मुदई सभे बा खफा ।। बाटे जौहर मरद बस उहे । नेह के जे जमावे जवा।।

एगो शेर

दूध के दूध पानी के पानी करीं, तबहूँ सँच बात झूठन के झूठा लगे। (जौहर शफियाबादी)

गजल

बेध गइल तन-मन के हमरा, घाव बड़ा गंभीर रहे । का जाने तोहरा अँखियन में कइसन-कइसन तीर रहे ।। रूप के पंक्षी लोभ नगर में लसराइल बेमोल भइल । भूल गइल ओकरे लिखे के आगे के तकदीर रहे ।। पूछीं महाभारत में खड़ा बा,नैतिकता के अर्जुन से । केकरा हाथ से पाशा छटकल,केकरा हाथ में चीर रहे ।। प्रीत के रीत कठिन जग माहीं,तबहूँ नेत ई चाहेला। पाँव में बेड़ी हाथ में हमरा,ममता जंजीर रहे।। प्रेम के जानल,प्रेम के मानल,प्रेम से देखल दुनिया के। केहू लैला, केहू मजनू , केहू राँझा - हीर रहे।। झुझुआ के जन देखीं अपने, परखीं ओकरा कृति के। भोजपुरी के जौहर एकला,गालिब,मोमीन,मीर रहे।।

गजल

सब लोग दिन में चाहता जुगनू देखाई दे । सबका नसीब में कहाँ , की तू देखाई दे । अइसन तोहार$ नेह बा,बइठल करेजा में, जइसे केहू के आँख में,जादू देखाई दे । तहरा सिवा केहू से ना मतलब लगाव बा, हमरा पसंद नइखे की केहू देखाई दे । तन-मन, नजर-निगाह में हमरा बा आइना, हर आईना में रूप ऊहे ऊ देखाई दे । जिनगी में छूप के आवेला कुछ लोग नेहो से, जइसे कहीं उधार के तम्बू , देखाई दे । भौंरा, कली, गुलाब,समय के बा आइना, लैला देखाई दे ,कबो मजनू देखाई दे । जौहर अहम-सोहम का ए झिझरी के खेल में, हम - हम देखाई दे , कबो तू-तू देखाई दे ।

गजल

आवे दीं आवे जे दुनिया में कहर आवेला। हमरा हर हाल में जीये के हुनर आवेला ।। घर से पहिले कबो रस्ता में नगर आवेला । तब कहीं जाके अबग-खास के घर आवेला ।। जब कबो सोंच के उड़ेला पताका ऊपर । भाव आकाश से धरती प उतर आवेला ।। पहिले-पहिले त समुन्दर के सतह थिरकेला । तब कहीं जाइके भूचाल भवँर आवेला ।। आज के जुग में का अरमान तमन्ना-इच्छा । होला कुछ अउर आ कुछ अउर नजर आवेला ।। छोड़ीं जौहर के बुझाइत त इहे हाल रहित । इनका बस नामें खुदा आठो पहर आवेला ।।

रुबाई-गजल

होसिला बा उहाँ । सामना बा जहाँ ।। हम खड़ा बानी अब, रउवा चाहीं तहाँ । चुप त बानी तबो, आँख में बा धुआँ । आज के बा समय, आगे- पीछे कुंआ । साँच के सामने, बा हुआँ आ हुआँ। लोग बा अब पढ़त, खाली इहवाँ- उहाँ । साध जौहर कहाँ, आदमी बा कहाँ ।

गजल

नेहिया का पथ में हमरा बाधा बनल बाहाँ ना, पीड़ा से मन के पंछी भटकल कहाँ-काहाँ ना । सुध-बुध हेरा गइल बा, सुख चैन अब काहाँ बा, जिनगी में चारू ओरिया पसरल बा अब वीराना । मेला में आदमी के अब बर्बादs जिन्दगी बा, नेहिया के बा छिटाइल अचके ताना-बाना । कइसे दरदs सुनाईं का लोरs ई हम देखाईं, लुट-पिटs के बा कहानी, उजड़ल बा आशियाना । माटी में मिल गइलs बा, अब सपना हँसी-खुशी के, टीसेला मन में आ के वादा कइल पुराना । चंदन सुवासs लेके उमकल कबो जे पछूआ, पिघिलेला बर्फs मन के आ ढुँढ़े नया ठिकाना । विश्वासो घातs जौहर हमरा से के ना कइलs, ई हो कहल बा मुश्किल आपन बा के बेगाना ।

गजल

बेध गइल तन-मन के हमरा, घाव बड़ा गंभीर रहे । का जाने तोहरा अँखियन में कइसन-कइसन तीर रहे ।। रूप के पंक्षी लोभ नगर में लसराइल बेमोल भइल । भूल गइल ओकरे लिखे के आगे के तकदीर रहे ।। पूछीं महाभारत में खड़ा बा,नैतिकता के अर्जुन से । केकरा हाथ से पाशा छटकल,केकरा हाथ में चीर रहे ।। प्रीत के रीत कठिन जग माहीं,तबहूँ नेत ई चाहेला। पाँव में बेड़ी हाथ में हमरा,ममता जंजीर रहे।। प्रेम के जानल,प्रेम के मानल,प्रेम से देखल दुनिया के। केहू लैला, केहू मजनू , केहू राँझा - हीर रहे।। झुझुआ के जन देखीं अपने, परखीं ओकरा कृति के। भोजपुरी के जौहर एकला,गालिब,मोमीन,मीर रहे।। डॉ जौहर साफ़ियाबादी

गजल

अदभुत गुलाबी रूप के परतर करी चन्दा कहाँ । बा पद्मिनी श्रृंगार के, दूसर कहीं उपमा कहाँ ।। उनका लुकाए भागे के, कइसन गरज अचके पड़ल । मानल गइल बा प्रीत में, नखड़ा कहाँ,परदा कहाँ ।। घाती ह्रदय से हीन का, जानी पराई पीड़ के । हs दर्द खाली दर्द बस,बसिया कहाँ,टटका कहाँ ।। अब प्रेम के मीरा कहीं,राधा कहीं,कान्हा कहीं । बा नेह में देखल गइल,करिया कहाँ,गोरा कहाँ ।। बस देख के उपरे-उपर,खेलत-हँसत बूझत बा लोग । ई दर्द बा कहवाँ बताई,होत बा चरचा कहाँ ।। अब साँच में का आँच जौहर,का कहीं सपना भइल । उनका काँती-रूप के,कतहूँ मिलत चेहरा कहाँ ।।

गजल

झोंका हवा के बनके,जे जेठ में ना चलतS,। हमहूँ कहाँ पनपतीं, तुहूँ कहाँ पनपत S।। जिनगी का रास्ता में, तूफान जो ना आइत, हमहूँ कहाँ बदलतीं, तुहूँ कहाँ बदलतS। पग-पग मुकाबला के ठोकर जदी ना लागित, हमहूँ कहाँ सम्भलतीं,तुहूँ कहाँ सम्भल तS। नेहिया के तहराअगनी दिल मेंअगर ना लागित, हमहूँ कहाँ दहकतीं, तुहूँ कहाँ दहकतींS! होइत ना उनका में जब गाई गोहार जौहर , हमहूँ कहाँ लपकतीं, तुहूँ कहाँ लपकतS।

गजल

पूछत बा लोग कइसे ई लागल नजर के चोट। ई उम्र भर के दर्द बा, सारा उमर के चोट ।। अब का सुनाईं दर्द देखाईं का, धाव के हम, कतना नगर के चोट बा, कतना डगर के चोट। पी के जहर सामाज के जे,अमृत के धार$दे, बाटे मरद जे सहलेबा नस-नस लहर के चोट। तितली से पान$फूल से,पंघट, पराग से अब, चंदा चकोरो से ना ई पूछीं कसर के चोट । साखी बा अपने आप में सारा गतर के दाग, बाहर से बाटे कुछ मिलल कुछ अपनो घर के चोट । जौहर जी साँच केहू के, आपन ना होला यार, कवने से अब देखाईं ई, अपना गतर के चोट ।

गजल

छन-छन के बनल-बिगड़ल,टाँकल बा हथेली पर । आवेले हंसी हमरा, जिनगी का पहेली पर ।। शुभ याद के परिछाहीं,सुसुकेले अँगनवा में । जब चाँदनी उतरेले, सुनसान हवेली पर ।। जीअत आ मुअत खाता,लागत बा कि बेटहा ह । जे गाँव का तरकुल का,बइठल बा मथेली पर ।। अब विधने भरम राखस,चुटकी भर सेनुरवा के । धड़कत बा करेजा की,गुजरल का सहेली पर ।। जिनगी का अन्हरिया में,कइसन ई अँजोरिया ह । बा नाम लिखल कवनो,मनरूप चमेली पर ।। जौहर जे निखरले बा,निअरे से जिनिगिया के । विश्वास करी ऊ का,माया के बहेली पर ।।

गजल

गीत जिनगी के गाईं कहाँ। आग मन के बुताईं कहाँ ।। उनका हँसला प रो देनी हम, लोर बाकी गिराईं कहाँ । हो गइल आदमी जानवर, ई रपट हम लिखाईं कहाँ । शब्द रचना के गर्मी से हम, कवनो पत्थर गलाईं कहाँ । लोग बा आन में शामिल तान में, अब गजल हम सुनाईं कहाँ ? भ्रम के आँधी त बा चल रहल, दीप जौहर जराईं कहाँ ।

गजल

प्रीत के पनका पोढ़ाइल,खत खुला अचके मिलल, दर्द के चम्पा फुलाये, के पता अचके मिलल । साँच देखे के सुने के,सबका बा हिम्मत कहाँ ? साध के एकला चले के बा रास्ता अचके मिलल । नेह का मंडी में आके, घाट ना तउलिले हम, तबहूँ हर एक मोड़ पर,भारी घटा अचके मिलल । जिन्दगी के हर डरारी, एक-एक अक्षर में बा, मोल-मर्यादा के रूत,हर साधना अचके मिलल । शांत ठहरल झील का,छाती प पत्थर फेंक के, भोला-भाला शोख ऊ,निसछल खड़ा अचके मिलल । हम मुहब्बत के पुजारी,स्वार्थ का देवी के साथ, दूर जाके राह में कुछ,फासला अचके मिलल । हम ना तौलिले अँजोरिया,के अन्हरिया बाट से, साँच कहाला के बड़ा,निर्मम सजा अचके मिलल । हार के बाजी जिये के, चेतना-चिंतन के बात, देखते तहरा के जौहर,हौसला अचके मिलल।

गजल

आइल बहार बन के,लुभा के निकल गइल। जिनगी के साँच केहू,लुका के निकल गइल।। हमरा घुटन के ,टीस के ,तड़पन - तरास$के, दिल में समा के खिल्ली,उड़ा के निकल गइल। हमरा से हमरे दर्द ई पूछत बा रातs-दिन अब। ऊ के रहे ,जे ,आग$ लगा के निकल गइल ।। बर्बाद जिन्दगी के कहानी में बाटे का। विश्वास घात ठेसs लगा के निकल गइल ।। सावन के रस फूहारs में पनघट पराग में। बेनाम बन के रासs रचा के निकल गइल। जौहर धरम के धीरs के धीरज-धमालs में, धनकल घरा कतो ना चोरा के निकल गइल ।

सवैया-गजल

जन-जन में भरल चहू ओर सजी,अपराध रूचि अति घातक बा । अगरी -पिछड़ी भर गाँव भइल, पावन जस लागत पातक बा ।। नेता के कवन नीति से गरज, कलयुग के इहे राजनीति भइल । जे भ्रष्ट बा आज बड़ा जेतना,ओतने ऊ बड़ा जननायक बा ।। घनघोर घटा निज स्वारथ के,उमरी -घुमरी चहू ओर धिरल। दिन-रात अमावस जस लागे, असरा के धुँआइल दीपक बा ।। कवने -कवने ना ठौर गइल, कत ठौर प हाथ ना पसरल बा । सब ठौर अभाव के भाव मिलल ,हर द्वार प लागल फाटक बा ।। बा देश के हाल बेहाल भइल, कुछुओ ना सही शुभ लउकत बा । कवनो तनी ज्ञान ना बा जेकरा, ऊ आज समाज-सुधारक बा ।। नाचत बा सभे बन-बानर बन, नटराजन के ता-ता सम पर । सपना बा भइल माटी के कथा, मतलब के सभे अब याचक बा।। अँखिया से गइल निदिया जौहर, सुख-चैन पराइल बा कब से । एह राज सुराज में आरक्षण, कुर्सी के बनावल नाटक बा ।।

गजल

भारी अकाल बाटे ओराइल विचार बा । इनरा में नेह-छोह के फाटल दरार बा ।। लम्बा शरीर ठूँठ बा भीतर से आदमी , सोगहग सवाल नेत के गाई गोहार बा । पत्थर से प्रेम, फूल से आ आदमी से बैर , सारा धरम-करम के अमावस अन्हार बा । चलनी आ सूप लाज के गठरी निनान सब, दँवरी भइल बे मेह$के गँऊवा हमार बा । रकटत बा अबहूँ आस के ठटरी फुहार ला, स्वारथ के पँजले आज ले सावन कुँवार बा। माई के हमरा बोल ई जौहर अनमोल ह$, शब्दो रतन जोगावे के हमरा जोगाड़ बा ।

गजल

नदी के धार जे मरुथल का ओरी मोड़ देबेला । उहे तरसत धरा के जल से नाता जोड़ देबेला।। हिमालय के टपे के लगन जेकरा के बढ़ावेला, ऊ चिंता गोड़ पीरइला के पीछे छोड़ देबेला। भरम बाँचल बा ओकरे दम से नेहिया के जगत्तर में, जे दू टूटल सनेही दिल के देखत जोड़ देबेला । कबो ऊ यात्रा के यातना से ना डरे राही, जे चलते-चलते फोड़ा गोड़ के सब फोड़ देबेला। कबो दुनिया भला ओकरा के कहियो ना कही जौहर, तनी सा बात पर जे कर के वादा तोड़ देबेला।

पूर्वी-निर्गुण

कलs पड़े दिनs नाही , नीनs पड़े रतिया हो । सइयाँ जी पेठवलें , गवनवा के पतिया हो ।। दागे-दागे भइल बाटे, हमरो चुनरिया । भइले बिहानs हमरा, सोचतो सेजरिया ।। पीछा कइले बाटे मोहs, हमरो सवतिया हो । सइयाँ......................... ।। कहवाँ धोआईं जाके , अपनो लुगरिया । जाए के बा अचके में , पिया के नगरिया ।। रही-रही सालेला, करेजवा में बतिया हो । सइयाँ.........................।। खोजी लेनी चारू ओरी, गउवाँ नगरिया । केहू बतलावत नइखे, सुबहित डगरिया ।। बलमू के मननी ना, लालच में बतिया हो । सइयाँ......................... ।। ज्ञानs-विज्ञानsनाहीं, धोएला कजरिया । गुरू नेक धोबिया के, जोहिले नजरिया ।। जौहर चलs सोचs फेरs मिथ्या से मतिया हो । सइयाँ जी पेठवलें, गवनवा के पतिया हो ।।

गजल

जब सखी नइखे । आदमी नइखे ।। चाँद बा तबहूँ , चाँदनी नइखे । का देखाई दे , रौशनी नइखे । बात दोस्ती के, दुश्मनी नइखे । अब कहीं के डर, बाहरी नइखे । आदमी जौहर , सब कोई नइखे ।

गजल

जिन्दगी अजनबी पहेली हs । छन में मुदई छने सहेली हs ।। हमरा आँखिन में आग के दरिया । लोग समझे सभे चमेली हs ।। जिन्दगी रन ह आ करम कुटिया । चंचली, मनचली, बहेली हs ।। केहू समुझल ना आज ले बाबू । जादू-टोना भरल हवेली हs ।। जिन्दगी के बा साधना जौहर । हमरा तकदीर के हथेली हs ।।

गजल

सब लोग दिन में चाहता जुगनू देखाई दे । सबका नसीब में कहाँ , की तू देखाई दे । अइसन तोहार$ नेह बा,बइठल करेजा में, जइसे केहू के आँख में,जादू देखाई दे । तहरा सिवा केहू से ना मतलब लगाव बा, हमरा पसंद नइखे की केहू देखाई दे । तन-मन, नजर-निगाह में हमरा बा आइना, हर आईना में रूप ऊहे ऊ देखाई दे । जिनगी में छूप के आवेला कुछ लोग नेहो से, जइसे कहीं उधार के तम्बू , देखाई दे । भौंरा, कली, गुलाब,समय के बा आइना, लैला देखाई दे ,कबो मजनू देखाई दे । जौहर अहम-सोहम का ए झिझरी के खेल में, हम - हम देखाई दे , कबो तू-तू देखाई दे ।

गजल

बेध गइल तन-मन के हमरा, घाव बड़ा गंभीर रहे । का जाने तोहरा अँखियन में कइसन-कइसन तीर रहे ।। रूप के पंक्षी लोभ नगर में लसराइल बेमोल भइल । भूल गइल ओकरे लिखे के आगे के तकदीर रहे ।। पूछीं महाभारत में खड़ा बा,नैतिकता के अर्जुन से । केकरा हाथ से पाशा छटकल,केकरा हाथ में चीर रहे ।। प्रीत के रीत कठिन जग माहीं,तबहूँ नेत ई चाहेला। पाँव में बेड़ी हाथ में हमरा,ममता जंजीर रहे।। प्रेम के जानल,प्रेम के मानल,प्रेम से देखल दुनिया के। केहू लैला, केहू मजनू , केहू राँझा - हीर रहे।। झुझुआ के जन देखीं अपने, परखीं ओकरा कृति के। भोजपुरी के जौहर एकला,गालिब,मोमीन,मीर रहे।।

गजल

सब लोग दिन में चाहता जुगनू देखाई दे । सबका नसीब में कहाँ , की तू देखाई दे । अइसन तोहार$ नेह बा,बइठल करेजा में, जइसे केहू के आँख में,जादू देखाई दे । तहरा सिवा केहू से ना मतलब लगाव बा, हमरा पसंद नइखे की केहू देखाई दे । तन-मन, नजर-निगाह में हमरा बा आइना, हर आईना में रूप ऊहे ऊ देखाई दे । जिनगी में छूप के आवेला कुछ लोग नेहो से, जइसे कहीं उधार के तम्बू , देखाई दे । भौंरा, कली, गुलाब,समय के बा आइना, लैला देखाई दे ,कबो मजनू देखाई दे । जौहर अहम-सोहम का ए झिझरी के खेल में, हम - हम देखाई दे , कबो तू-तू देखाई दे ।

गजल

आवे दीं आवे जे दुनिया में कहर आवेला। हमरा हर हाल में जीये के हुनर आवेला ।। घर से पहिले कबो रस्ता में नगर आवेला । तब कहीं जाके अबग-खास के घर आवेला ।। जब कबो सोंच के उड़ेला पताका ऊपर । भाव आकाश से धरती प उतर आवेला ।। पहिले-पहिले त समुन्दर के सतह थिरकेला । तब कहीं जाइके भूचाल भवँर आवेला ।। आज के जुग में का अरमान तमन्ना-इच्छा । होला कुछ अउर आ कुछ अउर नजर आवेला ।। छोड़ीं जौहर के बुझाइत त इहे हाल रहित । इनका बस नामें खुदा आठो पहर आवेला ।।

ग्राम गीत

गउंआ के मटिया में सोनवा फूलाला कि शहर में धूरा बिकाला तोहरा कइसे शहरिया सोहाला!! गउंआ से बसिया शहरिया में जाला, बोलऽ ना टटका भेंटाला? रहरी, मटरवा आ चनवा के कचरी, ताजा-ताजा अमृत बुझाला! तोहरा कइसे... सोन्हा-सोन्हा खूशबू, दवँरिया बघरिया के, सोना जस सरसो फूलाला रून-झुन बाजेला सनई के खेतवा से मुरई के पगरी बन्हाला! तोहरा कइसे... टूटही पलनिया में फगुआ आ चइता तऽ, गछुली में बिरहा गवाला बगिया में बोलेले कुंहुंकी कोइलिया कि बिरहा बसंत बुझाला तोहरा कइसे... अमवा, महुअवा से टपके मदन-रस, कोंचिआ, मोजरिया गोटाला पापी, पपिहरा के बिरहा के धुन में गोरिया के रहिया भुलाला! तोहरा कइसे... पकवा इनरवा पऽ पकड़ी का छइयाँ में, गरमी में गउंआ बटोराला जेठ-बइसखवा के तलफी भुभुरिया में, लड़िको नू पढ़े चलि जाला! तोहरा कइसे... गुल्ली-डन्टा, चकवा-चकइया के खेल जहां, संझा-पराती गवाला चिकवा में चिकपार, रण में बा नीति जहां, लुका-छुपी चोरवा धराला! तोहरा कइसे... भोरे- भोरे झांके साफ ललकी किरिनिया जहां, रतिया के चान अगराला मघवा में बघवा के धरे थरथरी जहां, भादो में कादो महाला! तोहरा कइसे.. चकवा-चकइया के नेहिया के गीत जहां, सुगवा-सुगनिया पोसाला मोरवा-मोरिनिया के नाँच देखी 'जौहर' के गउंए नू स्वर्ग बुझाला! तोहरा कइसे शहरिया सोहाला...

रुबाई-गजल

होसिला बा उहाँ । सामना बा जहाँ ।। हम खड़ा बानी अब, रउवा चाहीं तहाँ । चुप त बानी तबो, आँख में बा धुआँ । आज के बा समय, आगे- पीछे कुंआ । साँच के सामने, बा हुआँ आ हुआँ। लोग बा अब पढ़त, खाली इहवाँ- उहाँ । साध जौहर कहाँ, आदमी बा कहाँ ।

गजल

हमरा सब चल गइल बा पता। ई उड़ावल ह केकर हवा ।। तहरे किरिये कहीं, देखलS, आके सावन के उमड़ल घटा। धन बढ़ल ठीक है हSमन के ना, अपने अतने में गइनीं दहा । चान के मोल माटी भइल, रउवा बाँचीले बाँची कथा। बात तारा के पन्दरोह में , कइसे लिख दीं बताईं भला। साँच से लाभ केकर भइल, हीत- मुदई सभे बा खफा । बाटे जौहर मरद बस उहे, नेह के ,जे जमावे जवा ।

एक शेर

वह उँचाई मुझे न देना ख़ुदा सपनों में, जिस पे मैं पहुँचू और इंसानियत नीचे भटके। (जौहर शफियाबादी)

गजल

दरद जिन्दगी के सजा देले बानीं । हँसी उम्र भर के भुला देले बानीं ।। बहुत रंग बा भोजपुरियो गजल में । दिआ साधना के जरा देले बानीं ।। बा हमरा लकम चोट खाये, सहे के । हथेली से तितली उड़ा देले बानीं ।। कहाँ कवनो इंसान लउकत बा सोझा । नजर से त पर्दा हटा देले बानीं ।। घटा,फूल,पनघट,बसंती हवा में । कजरवा के बदरा बना देले बानीं ।। बुता देला जे आग मन के ए जौहर । उहे आग दिल में लगा देले बानीं ।।

गजल

चढ़ल जब से उनकर निशा लाहे-लाहे । पता हो गइल ला पता लाहे -लाहे ।। भइल सुनगुनी जबसे नेहिया के हमरा, सभे हो गइल बा खफा लाहे-लाहे । उठल कठकरेजी करेजवा से बिरहा, नजरिया से निकसे घटा लाहे-लाहे । बा पाँती में लीखल तरेंगन के बतिया, उहे बाटे उनको दशा लाहे-लाहे । बा हरियर भइल घाव बरिसन पुराना, चलल बैरी पुरूवा हवा लाहे-लाहे । गजल भोजपुरी में जौहर के सुनी के, जिनिगिया के आइल मजा लाहे-लाहे । इहाँ लोग आन्हर बा लउके ना दिन में, चलीं बार के अब दिआ लाहे-लाहे ।

गजल

तहरो मन में बा अरमान। तूहूँ राखs आपन मान ।। दिल रोए के बा पहचान, होंठन पर टूटल मुस्कान। दू आ दू ना होला चार , हठधर्मी के ई फरमान । नदिया चुप्पी साध के बोलल, आवे वाला बा तूफान । याद सताई तहरा एक दिन, जहिया लउकी गाँव वीरान । "जौहर " दानाई के बात, का समुझी जे बा नादान।

गजल

ई चुप्पी बा जे, से तूफान के बा हिया के विप्लवी अरमान के बा।। कबूतर का तरे मूड़ी लुका के समुझ लेलs हिफाजत जान के बा।। भुला आखिर गइल सेखी त तोहरो बताव अब इहाँ तू, बलवान के बा।। मिटावल चाहता ऊ नाम ले अब लड़ाई बहमरा ई पहचान के बा ।। धर्म-मजहब से बढ़के बाटे पइसा सुरूज के बा, बतावs चान के बा।। लगा के आग जे घूमत बा 'जौहर' पुजारी राम के, रहमान के बा ।।

चइती

मारी देली कान्हा जी के मतिया हो रामा, कुबरो सवतिया । काटे - धावे चइतs के रतिया हो रामा, कुबरो सवतिया ।। कहिके गइले श्यामs चिठ्ठिया पेठाएब, कउलSकरारsकइलें कबो ना भूलाएब। हमनी से कई देली घतिया हो रामा, कुबरो सवतिया ।। मारी देली,,,,, तड़पेली सखी सबS टपके कजरिया, जलSबिन तड़पे ले जइसे मछलिया । ताना मारे कुहूकी कोइलिया हो रामा,कुबरो सवतिया । । मारी,,,,,, हमनी से कवन चुकsभइल बा बतावस, आवस चाहे चिठ्ठिया में लिखी के पेठावस। जौहर श्याम भइले निरमोहिया हो रामा, कुबरो सवतिया ।।

गजल

हमरा सब चल गइल बा पता। ई उड़ावल ह केकर हवा ।। तहरे किरिये कहीं, देखलS, आके सावन के उमड़ल घटा। धन बढ़ल ठीक है हSमन के ना, अपने अतने में गइनीं दहा । चान के मोल माटी भइल, रउवा बाँचीले बाँची कथा। बात तारा के पन्दरोह में , कइसे लिख दीं बताईं भला। साँच से लाभ केकर भइल, हीत- मुदई सभे बा खफा । बाटे जौहर मरद बस इहे, नेह के ,जे जमावे जवा ।

गजल

दुख-सुख मिल के भोग सखी रे । जीवन बा संयोग , सखी रे ।। अपना खाये पर बा आफत, तबहूँ कर सहयोग सखी रे । बाँझ कबूतर का गइला के , लोग मनाई सोग सखी रे ? कुछ अपनन से गैर भला हs, बात कहे ई लोग सखी रे । कहहूँ में आसान कहाँ बा, शब्दन के प्रयोग सखी रे । जौहर कहले रजनीशो ई, भोग से आई योग सखी रे ।

गजल

सड़ गइल पानी नदी के,के कही। साँच ई नइकी सदी के,के कही ।। हाँ कही, डट के सजी जनता कही, तब समय के चौहदी के, के कही । आज के ई खेल सारा देख के, बात अब नेकी-बदी के, के कही । नाम पर मजहब-धरम के गेम बा, भेद ई लादा-लदी के, के कही । बन गइल लबरा चलीसा राज, झूठ खनदानी जदी के, के कही । बस इहे जौहर दशा बा देश के, अब सुदी के आ बदी के, के कही ।

गजल

रहल हS बहुत आस बरसात के। ऊ वादा के दिन बात पर बात के।। जोहत बाट सावन के भादो भइल, सुदिन कहिया आई मुलाकात के । कबो नेह के मोल लागल कहाँ , बहुत लोग अँकले बा औकात के। गुजर जाला दिन बाट उनकर जोहत, कहाँ नीन आवत बा अब रात के । निठुर छाती का जानी कवनो मरम, कलेवा के बायन के सौगात के । बिसरलीं हँ,तुलसी के कइसे कथा, अन्हरिया में भादो का निस रात के। के जौहर का नेहिया में सुनलस कतो, कहीं कवनो पचरा धरम - जात के ।

दोहा-गजल

बदलल-बदलल आज बा, हरजाई के रंग । फागुन लेके आ गइल बा, बौराई के रंग ।। चन्दा के अब झुण्ड जस, बन जाईं एक बार । कागज पर राखत रहीं, चिंताई के रंग ।। भोर भइल कुछ अउर बा, साँच परे कुछ अउर । हमरो देखत बहुत भइल, परछाईं के रंग ।। समय दशा के हाल पर, निकल गइल बा चीख । तन-मन पर अब चढ़ सकी माही सच्चाई के रंग ।। जंगल हो भा रण भूईं, आँसू हो या लार। सब के सब बा देखलीं, सौदाई के रंग ।। जौहर तीता छोड़ के, बोली मीठा बोल । दुनिया भर में बाँट दीं, अच्छाई के रंग ।।

गजल

लाजवन्ती कली के बात करीं । का-का उनका गली के बात करीं।। चाँद - सूरुज उगा के धरती पर, आज कुछ खलबली के बात करीं प्रेम के गावँ में टोला कइसन, कवना -कवना छली के बात करीं। साँच जाने -सुने के मन चाहीं, आज नारी बली के बात करीं । अबले बाटे भरम के आग जहाँ, धाह में दल-दली के बात करीं । ज्योत जौहर जगा के जिनगी के, अबका चाला-चली के बात करीं ।

गजल

भोरे -भोरे पढ़ीं अखबार के रोना रोईं । ज़िंदगी दर्द के अम्बार के रोना रोईं ।। जब विचारन के उड़ेला कबो जुगनू उपर । अब के इंसान के इतबार के रोना रोईं ।। माँझी बुद्धि के जे पतवार उड़ावेला कबो । दिल के नइया कबो मझधार के रोना रोईं ।। एटमी आज के हथियार के रोना रोईं । रउवा रोईंले भले प्यार के रोना रोईं ।। अब कहाँ कवनो गतर चोट से खाली बाटे । हीत-नाता कबो घर-बार के रोना रोईं ।। हीत मुदई में स्वारथ के बा अन्तर जौहर । रोईं एह पार कि ओह पार के रोना रोईं ।।

गजल

मौसम जोश-जवानी पर। कागा उचरे छान्ही पर ।। साजन के आवग सुन-सुन, अँखिया सुर्मादानी पर। तउलीं तs विश्वास करीं, कवनो मधुरी - बानी पर । गंगा में धोआता हाथ, नेतो धरम छानी पर । दिल छछनत बाटे प्यासा, नदिया घहरे चानी पर । जौहर साधो के आपन, नाव अकेला पानी पर ।

गजल

तीर हरदम कमान पर बाटे। तबहूँ खतरा सीवान पर बाटे।। लूट लेलS छली - छलावा से, अबके तहरा निशान पर बाटे।। भूख के मार कइसे सह पाई, भारी खतरा किसान पर बाटे। धर्न-मजहब के बेच के खालS, खाली कुर्सी ध्यान पर बाटे । लोग परहित से कट रहल बा अब, मर्द बाटे जे, शान पर बाटे ।। जीभ तहरो कटाई जौहर जी, साँच तहरो जबान पर बाटे ।

गजल

हाथ में फूल बा ना पत्थर बा । गाँव में तब का आजो हलचल बा ।। केहू आपन ना, केहू बेगाना, शहर में आदमी के जंगल बा । हम अकेला खड़ा उहाँ बानी अब, आगे - पीछे जहाँ दल-दल बा । हमरा संदेह बा मिलावटे के, लोर घड़ियाली बा कि निर्मल बा । आवेवाला समय कही अब जौहर, आज कतना समाज बगदल बा ।

गजल

अनबनी में अपनो घर कइसे फूँकाता देखलीं। फूल से फल से लदल गछिया कटाता देखलीं। । औने-पौने में बिकाता अब इहाँ कुछ आदमी, जे करे धोखाधरी अच्छा कहाता देखलीं । साधु अनशन में मरल गंगा छछन के रो पड़ल, देशभक्ति के नया सीमा खींचाता देखलीं । सामने बा लोभ-अहंकार के अब आदमी, राड़ के परचा इहाँ हर दिन बटाता देखलीं । मोल-मर्यादा गवाँ के लोग बोलत बा इहाँ, झूठअब साँचे नियर फरहर बुझाता देखलीं । खो गइल जौहर कहीं संवेदना बा आज-काल्ह, कुछ रोपाता, कुछ कहाता,कुछ सुनाता देखलीं ।

गजल

आवे दीं आवे जे दुनिया में कहर आवेला। हमरा हर हाल में जीये के हुनर आवेला ।। घर से पहिले कबो रस्ता में नगर आवेला । तब कहीं जाके अबग-खास के घर आवेला ।। जब कबो सोंच के उड़ेला पताका ऊपर । भाव आकाश से धरती प उतर आवेला ।। पहिले-पहिले त समुन्दर के सतह थिरकेला । तब कहीं जाइके भूचाल भवँर आवेला ।। आज के जुग में का अरमान तमन्ना-इच्छा । होला कुछ अउर आ कुछ अउर नजर आवेला ।। छोड़ी जौहर के बुझाइत त इहे हाल रहित । इनका बस नामें खुदा आठो पहर आवेला ।।

गजल

मुस्कुरा के जे चल सकत नइखे। कबहूँ दुनिया बदल सकत नइखे।। जबले शह ना हवा दे लहरन के, कवनो दरिया उछल सकत नइखे। उड़ सकत बाटे राह के पत्थर, बाकी लााते कुचल सकत नइखे। ऊ का प्रकाश दी जमाना के, जे दिया बन के जल सकत नइखे। दोस कागज के , का भला बाटे, खत से आँसू उबल सकत नइखे। हंस के जीयल कला हs जौहर जी, तीर दिल से निकल सकत नइखे ।

होरी

ब्रज में होरी खेलत नन्दलाल, फल-फूल मेवा रूप के झांके । पल-पल कान्हा के, चित आंके, पलछिन उड़तs गुलाल। ब्रज..............................।। अबीर-गुलाल के होड़ मचल बा, भांति-भांति के रूप सजल बा । झूमत कृष्ण गोपाल, ब्रज में..........................।। गोकुल के रंगरूट छोहरिया, अधजल भींगल धारी चुनरिया । पग-पग खेलतs चाल, ब्रज में......................... ।। जौहर प्रीतS के रीतS बतावे, सब सखी मिल-जुल फागsमनावे । जितs देखतsतीत लाल , ब्रज में............................. ।।

गजल

जवने मन में प्यार बा जौहर । ऊ जग में हुशियार बा जौहर ।। मंदिर -मस्जिद चर्च -शिवाला, सबके एके बस तार बा जौहर । जे जाने एह साँच के भाई, बेड़ा ओकर पार बा जौहर । भवसागर के मोह से उबरीं, देखीं घर उजियार बा जौहर। प्रेम धरमsहsप्रेम करमsह , बाकी सब बेकार बा जौहर ।

दोहा-गजल

बदलल-बदलल आज बा, हरजाई के रंग । फागुन लेके आ गइल बा, बौराई के रंग ।। चन्दा के अब झुण्ड जस, बन जाईं एक बार । कागज पर राखत रहीं, चिंताई के रंग ।। भोर भइल कुछ अउर बा, साँच परे कुछ अउर । हमरो देखत बहुत भइल, परछाईं के रंग ।। समय दशा के हाल पर, निकल गइल बा चीख । तन-मन पर अब चढ़ सकी माही सच्चाई के रंग ।। जंगल हो भा रण भूईं, आँसू हो या लार। सब के सब बा देखलीं, सौदाई के रंग ।। जौहर तीता छोड़ के, बोली मीठा बोल । दुनिया भर में बाँट दीं, अच्छाई के रंग ।।

गजल

कबो झील तितली कमल बन के आइल। दरद जिन्दगी के गजल बन के आइल ।। कबो याद के आग बे रंग झलकल, कबो ताज जइसन महल बन के आइल। बनल लोर बिरहा के पतझर के साखी, कबो गंगा-यमुना के जल बन के आइल। बड़ा नासमझ बा, पड़ोसी अभागा, बुतावे में घर के, खलल बन के आइल । भरोसा का धन-बल, जवानी के कवनो, कथा पूर्वजन के, कहल बन के आइल । पपीहा के बोली ना, बिरहा में भावे, कोइलिया के कुहकल, गरल बन के आइल । जहाँ राग अनहद-अलख के बा जौहर, उहाँ ज्ञान-गंगा, तरल बन के आइल ।

गजल

प्रीत के ई बात हsतs का कहीं । तोहरे ई घात हS तS का कहीं।। हमरा सोझा रात के पसरल अन्हार, तोहरा नजरी प्रात हS तS का कहीं । सब जगह बा, नेह के चर्चा भइल, ई महज शुरूआत हSत का कहीं। साँच सबसे बा कहल बड़का कठिन, का कहीं ई रात हS तS का कहीं । बा कहाँ जौहर के मन में लोभ-मोह, बस इहे सौगात ह SतS का कहीं ।

गजल

डाली - डाली ,पत्ता - पत्ता देखल जाई। तहरो एक दिन चप्पा-चप्पा देखल जाई।। बनके अपने भाग्य विधाता देखल जाई, दिल्ली आ बम्बे कलकता देखल जाई । घबड़ा के जन डेगs बढ़ाईं देखीं ना , आगे अउरी होई का-का देखल जाई । तू का कइलs हम का कइनी,सब बा लिखल, तहरो खाता हमरो खाता देखल जाई । सरहद प समझौता कइसन मारीं बस , मुदई बा, तब कइसन नाता देखल जाई । जौहर के सारा जिनगी बा रचनन में जब, दूसर का अब अत्ता - पता देखल जाई ।

गजल

नेहिया का पथ में हमरा बाधा बनल बहाना। पीड़ा से मन के पंछी भटकल कहाँ-कहाँ ना।। सुध-बुध हेरा गइल बा,सुख-चैनअब कहाँ बा, जिनगी में चारूओरिया पसरल बाअब विराना। मेला में आदमी के बर्बाद जिन्दगी बा, नेहिया के बा छिटाइल अचके में ताना-बाना। कइसे दरदS सुनाईं का लोर हम देखाईं , लुट-पिट के बा कहानी उजड़ल बाआशियाना। माटी में मिल गइल बा सपना हँसी-खुशी के, टीसत बा मन में आ के वादा कइल पुराना । चंदन सुवास लेके पछुआ कबो जे उमकल, पिघिलेला बर्फ मन के ढुँढ़े नया ठिकाना । विश्वासो घात जौहर हमरा से के ना कइलस, घाती बा ई बतावल आपन बा के बेगाना ।

मुस्लसल गजल

लोरी सोहर जरल भूख के आग में, झूठ, सच अनकहल-अनसुनल रह गइल । कवनो भँवरा रहे अउरी जल के परी, ऊ कहानी धराइल धरल रह गइल।। चाँद के आके बाँके किरण छू गइल, हम अँजोरिया में भींगल रहीं रात भर । ऊ किरण जब भुलाइल गइल हाथ से, चाँदनी-चाँदनी के रटल रह गइल । उनका मुखड़ा प गंगा क निर्मल चलन, उनका अँखियन में राधा के यमुना के जल। हमरा उनका से बहुते शिकायत रहे, उनके देखत अधूरा गजल रह गइल । उनका इंसानियत में कहीं शक ना बा, तबहूँ उनका से उम्मीद ई ना रहे । बनके आपन उड़वले हँसी नेह से, लाज से सिर गड़ल के गड़ल रह गइल। मिलले हमरा से अचके बड़ी नेह से, बाकी अचरज भइल उनका किरदार पर । उनका वादा करे के गरज का रहे, लोर अँखियन में आके भरल रह गइल । एक मंजिल बा "जौहर" बा बहुत रास्ता, अनगिनत आस्था लाख छन आईना । तबहूँ मंजिल उहे पा सकल, पा सकी, प्रेम में जे रँगाइल रँगल रह गइल ।

सूफी-होरी

साँवरिया संगे चल$आज खेलन होरी। अनहद नाद बजे घट भीतर,अंग-अंग झकझोरी ।। सँवरिया संगे चल $आज खेलन होरी। चंग-उमंग में खुसरू खेले,दंग-मृदंग कबिरा। ताल-तरंग मेंं दादू ,बुल्ले, रजनीशो कर जोरी। साँवरिया संगे चल$......... जायसी,मंज्जझन,कुतबन खेले, रसखानो चित-चोरी। ख्वाजा के दरबार का लय में ताल-तरंग बटोरी।। साँवरिया संगे चल$आज..... कुछ बाँटत हरिनाम के बखरा,कुछ साँई रंग-रोरी। कुछ बाँटत-चाटत हिय$अमृत कुछ दर्पण टकटोरी।। साँवरिया संगे चल$... ओका-बोका तीन तड़ोका ,सार रतन रस जोड़ी । अटकन-चटकन दही चटाकन सब से नाता तोड़ी ।। साँवरिया संगे..... झांझर-झॉझ झनाझन झनकत ईल्लाह के डोरी । जौहर दास$नबी संग खेले झगरत झोरा-झोरी ।। साँवरिया संगे ...

गजल

हमरा -तहरा से अचके भइल प्यार बा , एह में नाराज भइला के,का बात बा । पूछ के कहिया बरिसे ले कारी घटा , एह में नाराज भइला के,का बात बा ।। तन में मन में भरल नेह के धार बा, हर सितम अब गवारा-स्वीकार बा। प्रीत के रीत अद्भुत ह अमृत घड़ा, एह में नाराज भइला के,का बात बा।। आँख पहिले मिलल,बाद में दिल मिलल, धीरे- धीरे ई सुंगल गजब आग जस । मोह - माया के जादू चलल बे सुरा, एह में नाराज भइला के ,का बात बा ।। बात बा चल रहल आज संसार के, रूप का हाट के,तन का बाजार के । साँच बाटे कहाँ, लोग जौहर कहाँ, एह में नाराज भइला के,का बात बा ।।

गजल

तहरो अँखियन के मर गइल पानी। सुन के अँखियन में भर गइल पानी ।। लोर $ के मोल का उनुका सोझा, आ के अँखियन में भर गइल पानी। नरक$ नाला,नदी रहे बाकिर, जाके गंगा में तर गइल पानी । धरम$ के नाम पर लड़ाई बा, लाज$ से गिर के गड़ गइल पानी। दान$ अँजुरी से करके लवटल जे, ओकरा अँजुरी में भर गइल पानी। मोल$ मोती के का रहल जौहर , जहिया ओकर उतर गइल पानी ।

गजल

दिया हिया के जराईं बड़ा अन्हरिया बा । धरा से चाँद उगाईं बड़ा अन्हरिया बा ।। सनेह साध के सपना सोहागो बा सइँतल, नजर से दिल में अमाईं बड़ा अन्हरिया बा। कटाह$ रात आ सुनसाने राह जिनगी के, सम्हर के डेग बढ़ाई बड़ा अन्हरिया बा । गुलाबो आस के निरास बाटे आँखियन में, कबो त$ सामने आईं बड़ा अन्हरिया बा । परख के मोल के दर्पण बा साथे जौहर, खुदी के ज्योति जगाईं बड़ा अन्हरिया बा ।

गजल

प्रशन ऊठी ना ऊठी, चींख के उत्तर बोली । तोपs का मुँह पर, कहिया ले कबूतर बोली ।। मौसम का छाँह में, ठहरल बा अब गंगा जल, रउऐ सोंची भला, कहिया ले पवित्तर बोली । बीच गंगा में तपा जे बदन आइल बा, टूट के बोले त बोले दीं, बेहतर बोली । रातो आँखे में कटेले, सुनीं रउवो ई, पढ़ के चिठ्ठी के सुनब, रउवा भीतर बोली । लोगो बा पढ़ि-पढ़ि जरावे के जतन में नू अब, गाँवो विराना बनी त्रिया चरितर बोली । धर्मो के नामो प जे लोग लड़वावेला, कइसे ई जौहर कहस देवता पितर बोली ।

गजल

सर से बढ़के, उतार दीं चादर । आज मिथ्या के, फाड़ दीं चादर ।। के बा आपन, पराया के बाटे । जाँची, परखीं, निथार दीं चादर ।। आज-अब में, भविष्य, पनपे ला । काल्ह पर कइसे, डार दीं चादर ।। विह्न, बाधा से, लक्ष्य डिगे ना । धैर्य, धीरज के, झाड़ दीं चादर ।। धर्म-मजहब, भरम के दागल बा । कइसे सउंसे, पसार दीं चादर ।। दाग-बे-दाग कर के जौहर जी । जग में बिचरीं, बिचार दीं चादर ।।

गजल

लड़ाई हक के बा अपना, जतावल भी जरूरी बा । बतावल भी जरूरी बा, बुझावल भी जरूरी बा ।। कबो ई साँप बहिरा, ना सुनी कवनो मधुर भाषा, कड़क छिंउकी आ पैना से, जगावल भी जरूरी बा । खड़ा तूफान में होके बचावे के पड़ी टोपी, घड़ी भर माथ के अपना झुकावल भी जरूरी बा । सही अक्षर के खातिर मश्क करहीं के पड़ी बाबू, बनावल भी जरूरी बा, मिटावल भी जरूरी बा । बतावत बा इहे दर्शन से दर्शन जिंदगानी के, उगावे खातिर अपना के, डूबावल भी जरूरी बा । कबो जौहर ना देखस कोरा सपना जब दिन में कवनो, एही से आज उनका के घटावल भी जरूरी बा ।

गजल

जब केहू से हिजा-गिला राखीं । सामने अपना आइना राखीं ।। प्रेम केहू से जन करीं अचके । सामने सब दिशा-दशा राखीं ।। ताली एक हाथ से ना बाजेला । अपनो मन में दुआ-दया राखीं ।। रंग भरला के बात बा खाली । पहिले ढ़ाँचा बना-बना राखीं ।। अबकी जिनगी के बाँध टूटी सब । छूँछे कहिया ले आसरा राखीं ।। आज जौहर गजल के महफिल में । शेर खाँटी नया-नया राखीं ।।

गजल

जिन्दगी हो गइल लाचारs आवारा बादल। जइसे बसिया पड़ल अखबारs अावारा बादल।। मच गइल बाटे हा-हाकारs अावारा बादल, नेह-नाता बचल ना प्यारs आवारा बादल । युग का प्रभाव के हम कइसे नाकारीं भाई, धर्म-मजहब के सामाचारs आवारा बादल । गाँव में गाँधी के अरमान, तमन्ना सुसके, आदमीयत भइल लाचारs आवारा बादल। अपने कुछ साँचो के जाने के ना जतन जानी, सारा मिथ्या के बा बाजारs आवारा बादल । आस के रास समहारीं त कहस जौहर कुछ, कहिया बरिसे ला मुसलाधारs आवारा बादल।

गजल

नेह नाता के घइली घड़ा ले गइल । माथ आपन जिनिगिया मुड़ा ले गइल ।। रात अचके में आ के मड़इया तले । भूख केकर अँचरवा फड़ा ले गइल ।। माथ पर जेकरा कोइला, ललन पीठ पर । पेट ओकरो नथुनिया उड़ा ले गइल ।। लूट लिहलस गहनवाँ सजी लाज के । कँगना, पछुआ, पहुँचिया, कड़ा ले गइल ।। राते जौहर का अँखिया में रतिया रहल । केहू निनिया के हमरा चोरा ले गइल ।।

गजल

बेरी-बेरी पिरितिया सताई । याद जब तहरा अचके में आईं ।। बरिसे लागी नयनवाँ से सावन । चाँद अँगना में जब मुस्कुराई ।। ई ह दुनिया सम्हर के रहीं ना । कहियो धइला से ई ना धराई ।। देके जिनगी निरखले बा ऊ जे । कइसे तोहरा के देखी धधाई ।। तीनो भूवन में का साँच होला । जे समुन्दर में जाई, से पाई ।। एक नेकी आ बदी छोड़ जौहर । कुछ ना सँगवा में तहरा नू जाई ।।

गजल

लहरन में ऊ तान कहाँ बा । दरिया में तूफान कहाँ बा ।। लालच के बाजार गरम बा । अब जिंदा पहचान कहाँ बा ।। जुमला-बाजी आम भइल बा । बातन में कुछ जान कहाँ बा ।। स्वारथ मजहब-धरमब बनल बा । खोंजी ना ईमान कहाँ बा ।। मंदिर-मस्जिद चर्च, शिवाला । कवनो में भगवान कहाँ बा ।। जौहर जागीं लाज बचाईं । दूसर अब बलवान कहाँ बा ।।

गजल

उम्र भलहीं मिलल, जिन्दगी ना मिलल । खाली दिअना मिलल, रोशनी ना मिलल ।। खोजलीं काल्ह गाँवन में, शहरन में हम । लोग सगरी मिलल, आदमी ना मिलल ।। जहिया खेलल गइल, तेज से सूर्य के । चाँद थहरा गइल, चाँदनी ना मिलल ।। लोग बा झूठ में, मोह में, काल में । हम का झोखीं कि हमरा खुशी ना मिलल ।। जब से जौहर फकीरी में मनवा रमल । ठाट अइसन कहीं राजसी ना मिलल ।।

दोहा-गजल

बदलल-बदलल आज बा, हरजाई के रंग । फागुन लेके आ गइल, बौराई के रंग ।। चन्दा के अब झुण्ड जस, बन जाई एक बार । कागज पर राखत रहीं, चिंताई के रंग ।। भोर भइल कुछ अउर बा, साँझ परे कुछ अउर । हमरो देखत बहुत भए, परछाईं के रंग ।। समय-दशा के हाल पर, निकल गइल बा चीख । तन-मन पर अब चढ़ सकी, सच्चाई के रंग ।। जंगल हो भा रण भूईं, आँसू हो या लार। सब के सब बा देखलीं, सौदाई के रंग ।। जौहर तीता छोड़ के, बोलीं मीठा बोल । दुनिया भर में बाँट दीं, अच्छाई के रंग ।।

ग़ज़ल

मेरी धड़कनों की रवानी कहेगी । मेरा दर्द मेरी जवानी कहेगी ।। कहो बादलों से ज़रा मुस्कुरायें, जमीं आसमाँ की कहानी कहेगी। मुहब्बत में खाये हैं हम कितने धोखे, ग़ज़ल आँसूओं की जबानी कहेगी। मेरे शिशये दिल में तस्वीरे जाना है, जिसे सारी दुनिया निशानी कहेगी । मुहब्बत में जीना ,मुहब्बत में मरना, मेरी बंदगी जिंदगानी कहेगी । तेरी याद तेरा ही ज़िक्रे वफा है, यही मेरी जौहर नादानी कहेगी ।

गीत

सइयाँ मोरे जाई बसे मधुवन में । अब का करीं जिया मानत नाहीं, आग लगे तन-मन में । सइयाँ मोरे जाई बसे मधुवन में । कागा आ-आ शब्द सुनावे, सुतल बैरी आगs जगावे, ताकीं आस गगन में । सइयाँ मोरे जाई बसे मधुवन में । तन-मन, धन सइयाँ पर वारीं, आस मिलन के राह निहारीं। अऊर कहाँ कुछ मन में, सइयाँ मोरे जाई बसे मधुवन में । प्रीत के रीत कठिन जौहर बा, घट-घट में हरिहर-हरिहर बा । आग, धुआँ, दर्पण में, सइयाँ मोरे जाई बसे मधुवन में ।

गजल

लुभा जाला केहू , ठगा जाला केहू। जिनिगिया के ज्योति जगा जाला केहू।। केहू लोर पी के ठमक जाला अचके, गजल जिंदगी के सुना जाला केहू । कोई बनके काँटा नजरिया में खटके, कजरवा नयन से चुरा जाला केहू । सपनवा सजावल विसरले ना विसरे, नितरिया में अइसन समा जाला केहू। बहाना ना प्रीतिया का रीतिया के आवे, सनेहिया में पर के लूटा जाला केहू । गजल पढ़ के एक दिन कही लोग जौहर, अन्हरिया में चंदा उगा जाला केहू ।

गजल

हो गइल का से का देखते रह गइल। आँख फूटल लवा देखते रह गइल ।। चान गरहन से कहिया भला घट सकल, लोग बिगड़ल हवा देखते रह गइल । केहू सावन सजवले बा आठो पहर, केहू उमड़ल घटा देखते रह गइल । जोग- टोना भइल बे असर दर्द में, बैध आपन दवा देखते रह गइल । नेह उनकर पता झपसे हथिया लेलस, बुधिया आपन पता,देखते रह गइल । केहू जौहर जिनिगिया,लुटा के जीयल, केहू घाटा - नफा, देखते रह गइल ।

ग़ज़ल

सीतली बेयरिया ह अंचरा के छईयाँ । गिनाई दुख आपन कवन-कवन सइयाँ ।। अँखिया में जादू कजरिया में टोना, हमरा ना आवे करे कवनो चोन्हा । बिरहा के मातल रहब एही ठइयाँ, गिनाई दुख........................ । गउवाँ नगर छुटल बाबा अँगनइयाँ, सखिया सलेहरी आ सब पहुनइयाँ । चढ़ली जवनिया के रूत अंगरइयाँ, गिनाई दुख................... । जनी जा विदेश सइयाँ घरही में रहs, मिली-जुली दुखs सुखs संगे-संगे सहs । चहकी अंगनवा में अपनो चिरइया, गिनाई दुख .................... । शहरs के ओरी का बढ़ावेलs पउवाँ, ओकरो से निक बाटे देखs आपन गउवाँ । खेत खरिहनिया में बाजे शहनइयाँ, गिनाई दुख..................... ।

गजल

लुभा जाला केहू , ठगा जाला केहू। जिनिगिया के ज्योति जगा जाला केहू।। केहू लोर पी के ठमक जाला अचके, गजल जिंदगी के सुना जाला केहू । कोई बनके काँटा नजरिया में खटके, कजरवा नयन से चुरा जाला केहू । सपनवा सजावल विसरले ना विसरे, नितरिया में अइसन समा जाला केहू। बहाना ना प्रीतिया का रीतिया के आवे, सनेहिया में पर के लूटा जाला केहू । गजल पढ़ के एक दिन कही लोग जौहर, अन्हरिया में चंदा उगा जाला केहू ।

गजल

उहो नाज-नखड़ा दुलारsके,दिन याद बाटे तनी-तनी । सजी लाग बाझs श्रृँगारsके,दिन याद बाटे तनी-तनी ।। ऊ बसंतो कोइल फाग के,ऊ निठाहs टीसs के राग के, ऊ श्रृंगार गांवs के, यारs के, दिन याद बाटे तनी-तनी ।। कबो आके चमकल छुप गइल, कबो बात-बाते में रूस गइल । सजी भाव भेषs कुँआरs के, दिन याद बाटे तनी-तनी ।। कबो आके पूछत घातs के, कबो जाके रोवल रात के सब। ऊ बाहार कँगना कटारs के, दिन याद बाटे तनी-तनी ।। जवानी खेतs का हाथs पर, ऊ श्रृंगार सागs के माथ पर । उहो पुरूवा-पछुआ बयारs के, दिन याद बाटे तनी-तनी ।। गजल के जौहर गीत के, ऊ पहिल-पहिल छवि मीत के सकल। सजी अपना उनका करारs के, दिन याद बाटे तनी-तनी ।।

गजल

हो गइल का से का देखते रह गइल। आँख फूटल लवा देखते रह गइल ।। चान गरहन से कहिया भला घट सकल, लोग बिगड़ल हवा देखते रह गइल । केहू सावन सजवले बा आठो पहर, केहू उमड़ल घटा देखते रह गइल । जोग- टोना भइल बे असर दर्द में, बैध आपन दवा देखते रह गइल । नेह उनकर पता झपसे हथिया लेलस, बुधिया आपन पता,देखते रह गइल । केहू जौहर जिनिगिया,लुटा के जीयल, केहू घाटा - नफा, देखते रह गइल ।

गजल

पूछत बा लोग कइसे, ई लागल नजर के चोट । ई उम्र भर के दर्द बा, सारा उमर के चोट ।। हमका सुनाई दर्द देखाईं का घावs के अब, कतना नगर के चोट बा, कतना डगर के चोट । पी के जहर सामाज के ,जे अमृत के धारs दे, बाटे मरद ऊ सहले बा,नस-नस लहर के चोट । तितली से पानsफूल से पनघट,परागsसे अब, चंदा चकोरो से ना ई पूछीं कसर के चोट । साखी बा अपने आप में सारागतर के दाग, बाहर से बाटे कुछ मिलल,कुछ अपनो घर के चोट। जौहर जी साँच केहू के, आपन ना होला यार, कवने से अब देखाईं ई, अपना गतर के चोट ।

गजल

पहिलवठे कुछ यारsभइल बा,तहरा का हs। जिनगी में उजियारsभइल बा,तहरा का हs।। नगदा अउर उधारsभइल बा तहरा का हs। मिथ्या के संसारsभइल बा,तहरा का हs।। अधिया प ढ़ेला जन ढ़ोवsअब जन चहकs तूs, हमरा उनका प्यारs भइल बा, तहरा का हs। पंका पंकल बा बरिसन पर नेहिया में अब, वादा आ इकरारs भइल बा, तहरा का हs । लक्ष्य से ऊ कबहूँ ना डिगे जे धुन के पक्का, डूबल बा से पारs भइल बा, तहरा का हs । हमरे माथे खेली सारा दुख-सुख जिनगी के, चउँधा के बाजारs भइल बा, तहरा का हs । जेकरा के तू घास ना डललS हीन समुझ, ऊ सबअब हुशियारsभइल बा,तहरा का हs। जौहर का सपना के सोझा अचके में देखीं, मूठ्ठी में मजधारs भइल बा, तहरा का हs ।।

गजल

लड़ाई हक के बा अपना, जतावल भी जरूरी बा । बतावल भी जरूरी बा, बुझावल भी जरूरी बा ।। कबो ई साँप बहिरा ना सुनी कवनो मधुर भाषा, कड़क छिंउकी आ पैना से जगावल भी जरूरी बा । खड़ा तूफान में होके बचावे के पड़ी टोपी, घड़ी भर माथ के अपना झुकावल भी जरूरी बा । सही अक्षर के खातिर मश्क करहीं के पड़ी बाबू, बनावल भी जरूरी बा, मिटावल भी जरूरी बा । बतावत बा इहे दर्शन से दर्शन जिंदगानी के, उगावे खातिर अपना के, डूबावल भी जरूरी बा । कबो जौहर ना देखस कोरा सपना जब दिन में कवनो, एही से आज उनका के घटावल भी जरूरी बा ।

दोहा-गजल

दिल के अंदर चोर बा, मुंह पर बा मुस्कान । ओढ़ के चोला संत के, घुमत बा शैतान ।। उजड़ल खोता सामने, अंडा पर बा साँप । सारा चकनाचूर बा, पंछी के अरमान ।। लौट के पंछी आ गइल, होखत बा गदबेर । ई सुख ऊ ना पा सकी, ह्रदयहीन-विरान ।। के विपदा में बा घिरल, कब सोंची इंसान । मानवता के नाम पर, मचल राखी मान-गुमान ।। अँखियन में उम्मीदs के, सिसकत बाटे दीप । धरती पर बा स्वार्थ के, बारूदी तूफान ।। नीति-धरम कहवाँ गइल, जौहर के ईमान । बाहर से जगमग लगे, भीतर से सुनसान ।।

गजल

बाँटे-छाँटे, आँके आँख । नीचे-ऊपर झाँके आँख।। धन-धन बा संसार छबिs । अगराइल बा पाके आँख ।। भाग्य-भरोसे करमो फूटी । सूती रोके, गाके आँख ।। लड़ जाला हो जाला चार। रूपो नगर आके आँख ।। जौहर बाहर ना भेंटेला। भीतर देखीं जाके आँख ।।

गजल

ई चुप्पी बा जे, से तुफान के बा । हिया के विप्लवी अरमान के बा ।। कबूतर का तरे मूड़ी लुका के । समुझ लेलs हिफाजत जान के बा ।। भुला आखिर गइल सेखी त तोहरो । बतावs अब इहाँ तू, बलवान के बा ।। मिटावल चाहता ऊ नाम ले अब । लड़ाई हमरा ई पहचान के बा ।। धर्म-मजहब से बढ़के बाटे पइसा । सुरूज के बा, बतावs चान के बा? लगा के आग जे घूमत बा जौहर। पुजारी राम के, रहमान के बा ।।

गजल

आवे दीं आवे जे दुनिया में कहर आवेला । हमरा हर हाल में जीये के हुनर आवेला ।। घर से पहिले कबो रस्ता में नगर आवेला । तब कहीं जाके अबग-खास के घर आवेला ।। जब कबो सोंच के उड़ेला पताका ऊपर । भाव आकाश से धरती प उतर आवेला ।। पहिले-पहिले त समुन्दर के सतह थिरकेला । तब कहीं जाइके भूचाल भवँर आवेला ।। आज के जुग में का अरमान तमन्ना-इच्छा । होला कुछ अउर आ कुछ अउर नजर आवेला ।। छोड़ी जौहर के बुझाइत त इहे हाल रहित । इनका बस नामें खुदा आठो पहर आवेला ।।

गजल

जब सखी नइखे । आदमी नइखे ।। चाँद बा तबहूँ , चाँदनी नइखे । का देखाई दे , रौशनी नइखे । बात दोस्ती के, दुश्मनी नइखे । अब कहीं के डर, बाहरी नइखे । आदमी जौहर , सब कोई नइखे ।

दोहा-गजल

दिल के अंदर चोर बा, मुंह पर बा मुस्कान । ओढ़ के चोला संत के, घुमत बा शैतान ।। उजड़ल खोता सामने, अंडा पर बा साँप । सारा चकनाचूर बा, पंछी के अरमान ।। लौट के पंछी आ गइल, होखत बा गदबेर । ई सुख ऊ ना पा सकी, ह्रदयहीन-विरान ।। के विपदा में बा घिरल, कब सोंची इंसान । मानवता के नाम पर, मचल राखी मान-गुमान ।। अँखियन में उम्मीदs के, सिसकत बाटे दीप । धरती पर बा स्वार्थ के, बारूदी तूफान ।। नीति-धरम कहवाँ गइल, जौहर के ईमान । बाहर से जगमग लगे, भीतर से सुनसान ।।

गजल

जवने मन में प्यार बा जौहर । जग में ऊ हुशियार बा जौहर।। जे जाने एह साँच के भाई। बेड़ा ओकर पार बा जौहर।। मंदिर -मस्जिद चर्च,शिवाला । सबके एके बस तार बा जौहर।। भवसागर के मोह से उबरीं। देखीं जग उजियार बा जौहर।। प्रेम धरम$ ह$ प्रेम$करम ह। बाकी सब बेकार बा जौहर।।

दोहा - गजल

लेके जाईं का सखी, हम साजन घर काँच? उनका अन्दर प्रेम यश, हमरा अंदर काँच । पल में भुरकुस हो गइल, क्षण में चकनाचूर । रावण जइसन रूढ़ के, अंदर-बाहर काँच ।। सपना परिछाहीं बनल, नाचत बा हरओर । टूटी खिड़की नीन के, लउकी घर भर काँच ।। बाँचल के बा मोह से, बोल सखी रे बोल । मंदिर, मस्जिद, चर्च में, नीचे-ऊपर काँच ॥ आवे वाला बा समय, तौली-परखीं बोल । केकर बा शीशा कहीं, आ हम के कर काँच ।। जौहर मुखड़ा आस के, कहवाँ लेके जास । चूर-चूर दर्पण भइल, बा पग-पग पर काँच ।।

गजल

डाली - डाली ,पत्ता - पत्ता देखल जाई। तहरो एक दिन चप्पा-चप्पा देखल जाई।। बनके अपने भाग्य विधाता देखल जाई, दिल्ली आ बम्बे कलकता देखल जाई । घबड़ा के जन डेगs बढ़ाईं देखीं ना , आगे अउरी होई का-का देखल जाई । तू का कइलs हम का कइनी,सब बा लिखल, तहरो खाता हमरो खाता देखल जाई । सरहद प समझौता कइसन मारीं बस , मुदई बा, तब कइसन नाता देखल जाई । जौहर के सारा जिनगी बा रचनन में जब, दूसर का अब अत्ता - पता देखल जाई ।

भोजपुरी गजल

कहीं बबूल के पतई कहीं चिनार के पत्ता । धधक रहल बा ई देखीं ना देवदार के पत्ता ।। केहू बा लूटे खोसोटे में अब लसार के पत्ता, गुजारा बा करत इहवाँ केहू बहार के पत्ता । इहाँ विश्वास घाती लोग बा अपनो केअब देखीं, छिटाई तास के पत्ता नियर इतबार के पत्ता । बहुत चलाक ना बने के चाहीं सोंच लीं अपने, समय लुकावे ना गिन-गिन के खोली यार के पत्ता । आजादी बा इहाँ चरे के लोगs चरतो बा छुटा, केहू चबावता बेला केहू अनार के पत्ता । खुलल बा आज के ताजा गजल में देख लs जौहर, कहीं एह पार के पत्ता कहीं ओह पार के पत्ता ।

गजल

आवे दीं आवे जे दुनिया में कहर आवेला । हमरा हर हाल में जीये के हुनर आवेला ।। घर से पहिले कबो रस्ता में नगर आवेला । तब कहीं जाके अबग-खास के घर आवेला ।। जब कबो सोंच के उड़ेला पताका ऊपर । भाव आकाश से धरती प उतर आवेला ।। पहिले-पहिले त समुन्दर के सतह थिरकेला । तब कहीं जाइके भूचाल भवँर आवेला ।। आज के जुग में का अरमान तमन्ना-इच्छा । होला कुछ अउर आ कुछ अउर नजर आवेला ।। छोड़ी जौहर के बुझाइत त इहे हाल रहित । इनका बस नामें खुदा आठो पहर आवेला ।।

आज के दर्पण

अच्छा-खासा खेल-तमाशा,हम का जानी। उलटा-सीधा तहरे लिला, हम का जानी ।। एड़ी,दोरी,तिलया,चौरी- चाभा ले बा, धोखा के ई ताना-बाना, हम का जानी । निकल गइल विश्वास समय का हाथो से, झूठो इहवाँ साँच कहाला, हम का जानी । तहरा भरमावे आवे ला लूट$-पाट$ , मिथक वादा,खास बहाना,हम का जानी। दाढ़ी- टोपी, चंदन- टीका हाय-हाय $, अइसन होलें भक्त-दिवाना,हम का जानी। अतने भर बा,साँचो जगत के जौहर जी, लागल बाटे आना-जाना, हम का जानी ।

गीत

सीतली बेयरिया ह अंचरा के छईयाँ । गिनाई दुख आपन कवन-कवन सइयाँ ।। अँखिया में जादू कजरिया में टोना, हमरा ना आवे करे कवनो चोन्हा । बिरहा के मातल रहब एही ठइयाँ, गिनाई दुख........................ । गउवाँ नगर छुटल बाबा अँगनइयाँ, सखिया सलेहरी आ सब पहुनइयाँ । चढ़ली जवनिया के रूत अंगरइयाँ, गिनाई दुख................... । जनी जा विदेश सइयाँ घरही में रहs, मिली-जुली दुखs सुखs संगे-संगे सहs । चहकी अंगनवा में अपनो चिरइया, गिनाई दुख .................... । शहरs के ओरी का बढ़ावेलs पउवाँ, ओकरो से निक बाटे देखs आपन गउवाँ । खेत खरिहनिया में बाजे शहनइयाँ, गिनाई दुख..................... ।

हुँकार

नवही नववर्ष का कलियन के, ई साल नया उसकावत बा । हुँकार करत, मरजाद भरत, जिनगी के राग, सुनावत बा ।। अब उठs मशाल लs हाथन में, नव भारत के निर्माण करs । एह मातृभूमि के कण-कण के, दिन-रात नया श्रृंगार करs ।। एकता के दीप जले पथ में, निज मानवता के शान रहे । ई विश्व नयन के ज्योति बने, कुछ अइसन कर्म महान रहे ।। बापू के स्वप्न ना टूट सके, एक दूजे पर उपकार करs । अब उठs....................................।। अबो गुलामी गइल कहाँ बा, कुछ तs भइया मानs । पूँजीवाद के चंद्रमुखी, ई काs हs कुछ तs जानs ।। ई नीति त असह गरल बा, उठs बढ़sउपचार कर । अब उठs................................ .......।। जब घोर अन्हरिया के पीड़ा, दुतकार गइल दुर्योंधन के । तब भीष्म पितामह के शय्या, हुँकार उठल अरिमर्दन के ।। बा धर्म युध्द में कृष्ण खड़ा, पारथ जागs संघार करs । अब उठs..................................।। एह मातृभूमि के कण-कण के, दिन-रात नया श्रृंगार करs ।।

गजल

अखबारी झकझोर खबर बा, हमहूँ सोंचीं तुहूँ सोंचs । मानवता के क्षय के डर बा, हमहूँ सोंची तुहूँ सोंचs ।। आकुल नयन बेचैन अधर बा, हमहूँ सोंची तुहूँ सोंच । सारा सपना एहर-ओहर बा, हमहूँ सोंची तुहूँ सोंचs ।। सुना पंघट गाँव नगर बा, हमहूँ सोंची तुहूँ सोंच । जीवन कतना टेढ़ डगर बा, हमहूँ सोंची तुहूँ सोंचs ।। काँच के हमरो-तहरो घर बा, हमहूँ सोंची तुहूँ सोंचs हाथ में हमरो-तहरो पत्थर बा, हमहूँ सोंची तुहूँ सोंचs ।। सत्ता के बेमोल लड़ाई, उलझल बारें भाई-भाई । खतरा सबतर आठो पहर बा, हमहूँ सोंची तुहूँ सोंचs ।। मज़हब धर्म में झगड़ा कइसन? मानवता में रगड़ा कइसन । स्वारथ सब झगड़ा के जड़ बा, हमहूँ सोंची तुहूँ सोंचs ।। अंधा नगरी चौपट राजा, जस भाजी तस बाटे खाजा । सच्चाई कहवाँ जौहर बा, हमहूँ सोंची तुहूँ सोंचs ।।

गजल

ई दर्द का सुनाईं, ई लोर का देखाईं । अरमान के चिता पर, रोईं कि गीत गाईं ।। हहरत हिया में हमरा, लहरत तूफान बाटे । जिनगी के नाव कवना, अब घाट पर लगाईं ।। कोइल के कूक सुन के, कुहकत बा हमरो काया । सब हीत-मीत जाके, होने हँसी उड़ाई ।। बाटे जे पास हमरा, किस्मत के अपना बखरा । ई आग अउर कतना छाती में हम दबाईं ।। अमृत के बाट में ई, घोरल ह तहरे माहुर । पीहीले बन के शंकर, तहरा से का पिआईं? एह मोह का नगर के, कारिख का कोठरी से । चुपचाप बबुआ जौहर नाता छोड़ा के जाईं ।।

गजल

जे चाहीं रउवा छीन लीं, पहुँचा मरोड़ के । बाकिर ई आग सुनुगी त जाई ना छोड़ के ।। संतोषs हम करीले दिलासा के बा लकम । अँजुरी में अपना आँखs के मोती बटोर के ।। जनता से दूरs ताजमहल के कनून बा । रउवे बताईं, चोर सहेला अँजोर के ? कुर्सी के लोभs नाच रहल बाटे रोड पर । जागत बा गाँव रातs में टोला अगोर के ।। गजरा के बा गमकs ना, कजरा कटार बा । लिख द गजलs करेज के कनखा खँखोर के ।। जौहर डड़ेर खेतs के कचरत बा पान जस । का साँचो में बा आँच कहीं हाथ जोड़ के ।।

गजल

चाह बोलत बा आह का बोली। कतना बोली गुनाह का बोली ? जीत केकरा से ई रोकाई अब । तय भइल बा गवाह का बोली ।। आज विश्वास उठ रहल बाटे । बे पनाही - पनाह का बोली ? देख के रउवा नू चले के बा । राह बोलेला,राह का बोली ।। तेज-प्रताप ले गइल लालच । आज जिनगी चोटाह का बोली।। बोल अनमोल बाटे जौहर के । साँच केहू निठाह का बोली ।।

गजल

हिया के शीशमहल में सजा रहल बानीं । ई तहरा नेह के बयना जोगा रहल बानीं ।। कुचुट करेजो के कनखा खखोरत बा तबहूँ हम। पलक का ओट में सावन छूपा रहल बानीं ।। चलीं ना साँच के जाने के कुछ जतन जानी । लूटा के फूल के पत्थर जोगा रहल बानीं ।। छलावा मोह के घाती के घात बा तबहूँ । चिरागs आस के अबले जारा रहल बानीं ।। चलीं ना पूछ लीं जौहर से जोग जिनगी के । गजल ई लोर से लिख के सूना रहल बानीं ।।

गजल

रूप जादू नजर में टोना बा । अंगे-अंगे बदन सोलोना बा ।। उठ गइल बा भरोसा जे हमरो । एतने बतिया के आजो रोना बा ।। हम का सपना में चाँदs प उतरीं । जे बा होखे के अब ऊ होना बा ।। नेह हमनी जोगा के राखीले । दउरी-डगर बा, हमरा मोना बा ।। नाम से उनका जुड़ गइल बानीं । बस इहे ओढ़ना-बीछौना बा ।। सारा संसार बा जेमे 'जौहर' । हमरा दिल के अथाहs कोना बा ।।

गजल

प्रशन ऊठी ना ऊठी, चींख के उत्तर बोली, तोप का मुँह पर, कहिया ले कबूतर बोली । मौसमन का छाँह में, ठहरल बाजे गंगा के जल, रउऐ सोंची भला, कहिया ले पवित्तर बोली । बीच गंगा में तपा के, जे बदन आइल बा, टूट के बोले त बोले दीं, ऊ बेहतर बोली । रात आँखे में कटेले, सुनीं रवे किरिये, पढ़ के चिट्ठी में सुनब, रउवा जे भीतर बोली ।। लाद के कान्ह प दुख-सुख के, चले ले जिनगी, फेंकी पाला, उहे परूवा, उहे कातर बोली । लोग पढ़ि-पढ़ि के, जरावे के जतन सोचत बा, गाँव विराना बनी, शहर में गीदड़ बोली । धर्म का नाम पर जे, रोज लड़ावत बाटे, हम का जानी भला, ऊ देवता-पितर बोली ।

गजल

उमड़ल नदी के धार बा, हम का गजल कहीं । मुर्छित भइल बाहार बा, हम का गजल कहीं ।। पँखुरी गुलाबs के कहीं की ठोर हम कहीं । असमन कमल ऊतार बा, हम का गजल कहीं ।। बा फूल अंगs अंगs त मुखड़ा बा चाँद जइसन । कजरा बनल अब कटारs बा, हम का गजल कहीं ।। तुलसी, कबीर, जायसी, आ कालिदास के । एकजुट भइल श्रृंगार बा, हम का गजल कहीं ।। अँगना में चाँदो आके, ऊदासी लूटा गइल । भगिये भइल ऊलार बा, हम का गजल कहीं ।। जौहर जी उनका बात के, का फुलझड़ी कहीं । सावन के रस फूहार बा, हम का गजल कहीं ।।

गजल

प्रशन ऊठी ना ऊठी, चींख के उत्तर बोली, तोप का मुँह पर, कहिया ले कबूतर बोली । मौसमन का छाँह में, ठहरल बाजे गंगा के जल, रउऐ सोंची भला, कहिया ले पवित्तर बोली । बीच गंगा में तपा के, जे बदन आइल बा, टूट के बोले त बोले दीं, ऊ बेहतर बोली । रात आँखे में कटेले, सुनीं रवे किरिये, पढ़ के चिट्ठी के सुनब, रउवा जे भीतर बोली ।। लाद के कान्ह प दुख-सुख के, चले ले जिनगी, फेंकी पाला, उहे परूवा, उहे कातर बोली । लोग पढ़ि-पढ़ि के, जरावे के जतन सोचत बा, गाँव विराना बनी, शहर में गीदड़ बोली । धर्म का नाम पर जे, रोज लड़ावत बाटे, हम का जानी भला, ऊ देवता-पितर बोली ।

गजस

ई चुप्पी बा जे, से तुफान के बा । हिया के विप्लवी अरमान के बा ।। कबूतर का तरे मूड़ी लुका के । समुझ लेलs हिफाजत जान के बा ।। भुला आखिर गइल सेखी त तोहरो । बतावs अब इहाँ तू, बलवान के बा ।। मिटावल चाहत ऊ नाम ले अब । लड़ाई हमरा ई पहचान के बा ।। धर्म-मजहब से बढ़के बाटे पइसा । सुरूज के बा, बतावs चान के बा? लगा के आग जे घूमत बा जौहर। पुजारी राम के, रहमान के बा ।।

गजल

कबो झील तितली कमल बन के आइल । दरद जिन्दगी के गजल बन के आइल ।। कबो याद के आगल , बेरंग झलकल , कबो ताज जइसन महल बन के आइल । कबो लोर बिरहा के, पतझर के साखी, कबो गंगा-यमुना के, जल बन के आइल। बड़ा ना समझ बा, पड़ोसी अभागा, बुतावे में घर के,खलल बन के आइल। भरोसा का धन-बल, जवानी के कवनो, कथा पूर्वजन के, कहल बन के आइल। पपिहा के बोली ना, बिरहा में भावे, कोइलिया के कुहकल,गरल बन केआइल। जहाँ राग अनहद-अलख के बा जौहर, उहाँ ग्यान गंगा, तरल बन के आइल ।

गजल

खिल्ली उड़ावत बाटे ऊ हमरा लिलार के। चमकत बा जेकरा मांग में सेनूर उधार के।। कागज के फूल गमकी बा आशा सिंगार के, सइँतल बा हमरा आँख में सपना बहार के। मिथ्या के गाँव$ में बा कंचन चरत सभे, देखत कहाँ बा केहूअब अँखिया पसार के। केहू के साथ देला ना केहू के खास ह$, बहसत समय बा,रात-दिन हकवा पुकार के। परहित,क्षमा-दया गइल मजहब-धरम डूबल, तरसत बा लोग$ नेह के, गाई गोहार के। नइकी सदी से जौहर नेहो बा, उठ रहल, मंथन करे के चाहीं अब अपना विचार के।

ग़ज़ल

यूँ मुस्करा के आग लगाने से फायदा। एक दिल जले को और जलाने से फायदा। भूले से जिस ने मुझ पे तवज्जो कभी नही, उस बे वफा से दिलको लगाने से फायदा। अब ख़त्म होरही है मुहब्बत भी हर तरह से, जलता हुआ चेराग़ बुझाने से फायदा । अपने किये की आप सजा पा रहें हैं लोग , सबकुछ लूटा के होश में आने से फायदा। जब मक़सदे हयात से गा़फिल रहे तो फिर, आने से फायदा क्या, जाने से फायदा । जो चाहे आके देख ले तस्वीरे ज़िंदगी, जौहर मैं आईना हूँ छुपाने से फायदा ।

गजल

चर्चा में चारू ओर बा नारी के मोल-भाव । धोती के,कुर्ता,कोर्ट के साड़ी के मोल-भाव।। अब घट रहल बा रोज आके रउवो देखीं ना ई। मजहब-धरम के मुल्ला-पुजारी के मोल-भाव।। कुछ लोगअब बा जे कुकरमो के बूझत सुकर्म बा। अब अपनो गाँव में नू बा शिकारी के मोल-भाव।। मजहब-धरम से ऊँच ह मानव धरम के बात । अबले बा रउरा मन में नू कटारी के मोल-भाव।। जौहर समय के रूप आ दर्पण बा हाथ में जब। एक दिन जरूर लगबे करी अनाड़ी के मोल-भाव।।

गजल

साध मन के ध्यान पर राखीं । तीर हरदम कमान पर राखीं।। जीत - हारे के नाम जिनगी ह$। हौसला आसमान पर राखीं ।। अब त साँचो हवा ई ठमकल बा। मन के चिरई उड़ान पर राखीं ।। देश भक्ति के , अब तकाजा बा । डीठ निश-दिन सीवान पर राखीं।। का भरोसा बा बल्ब-बिजली के। कवनो दिअना मकान पर राखीं ।। पहिले जौहर जी आँख अपना पर। फेरु दुनिया - जहान पर राखीं ।।

गजल

कहानी दर्द के हमरा कही फसाना कही । भुला ना पाई जामाना सजी जमाना कही ।। अजब बा रीत इहाँ के,भरम नगरिया के अब। कहीं जो साँच त$ओके सभे बाहाना कही।। गजब के लोच आ टीसो-कसक बा,नेहिया में। बहार ना-ना में होला,केहू त$हाँ ना कही ।। दरद जे आइल बा बखरा में हमरा जतरा से। समय के लोर के हमरा, केहू घटा ना कही ।। उठा के रेत के भीतो के छाँह पावल भला । कही लैला, कही मजनू कही दीवाना कही ।। लूटा के फूल जे पत्थर बटोरी जौहर सजी । ऊ हमरा लोर के नगमा, गजल-तराना कही।।

गजल

दर्द छाती के जे अँखियन में सजवले होई । प्रेम का गाँव में ऊ आगsलगवले होई ।। भर गइल होई मुहब्बत के गगरिया अचके । जब केहू यादs का पनघट से उठवले होई ।। प्रीत के रीत मुहब्बत के चलन झलकत बा । नाम हमरो केहू उनका से बतवले होई ।। आ रहल बा जे गमक यादs का कान्हे चढ़के । केहू केसर नू कहीं जिनगी के छुपवले होई ।। तोहरा लिलरा से जे जौहर लहू टपकत बा । होई अपने केहू, पत्थर जे चलवले होई ।।

गजल

तहरो मन में बा अरमान । तूहूँ राख$ आपन मान ।। दिल रोये के बा पहचान। होंठन पर टूटल मुस्कान।। दुआ दू ना होला चार । हठधर्मी के ई फरमान ।। नदिया चुप्पी साध के बोले। आवे वाला बा तूफान ।। याद सताई तहरा एक दिन। जहिया लउकी गाँव वीरान ।। जौहर दानाई के बात । का समुझी जे बा नादान ।।

गजल

वेष - भूषा के तन के देखत बा। अब कहाँ लोग मन के देखत बा।। लोग बाटे पड़ल स्वार्थ में अब । कहवाँ सतबन-वचन के देखत बा।। आदमी बाटे पशु का माया में । बाघ बनके हिरण के देखत बा ।। केहू देखत कहाँ बा अपना के । बाकी अनका रहन के देखत बा ।। फूल से बैर बा जेकरा, ऊ । आज बगिया-चमन के देखत बा ।। बोल जिनिगी के जौहर गजल में । केहू फनकार फन के देखत बा ।।

गजल

उम्र भलहीं मिलल, जिंदगी ना मिलल । खाली दियना मिलल, रौशनी ना मिलल ।। खोजलीं काल्ह गाँवन में, शहरन में हम । लोग सगरी मिलल, आदमी ना मिलल ।। जहिया खेलल गइल तेज से सूर्य के । चाँद थहरा गइल चाँदनी ना मिलल ।। लोग बा झूठ में, मोह में, काल में । हम का झोखीं कि हमरा खुशी ना मिलल ।। जब से जौहर फकीरी में मनवा रमल । ठाट अइसन कहीं राजसी ना मिलल ।।

गजल

दर्द के झील में चंचल काया । जिन्दगी घाम ह कबो छाया ।। गीत कविता गजल के साखी ह$। हीर-राँझा के कृष्ण के माया ।। अजनबी राह के अबुझ पंछी । गाछ जहवाँ बा ना कहीं साया ।। कर्म के तीर आँख मछरी के । कहवाँ, बाजी, कहाँ माया-दाया ।। साँच लउके ना टेढ़ आँखिन से । राखीं जिनगी में शर्मों-हाया ।। भीत जौहर पुरान गिरबे करी। तब नू उठी इहाँ नाया-नया ।।

गजल

रूप सूरूज मयाब का सोझा। मुखड़ा राउर गुलाब का सोझा ।। देतीं उपमा अगर मिलित कवनो । आईं रउवे जवाब का सोझा ।। मन बा चाहत कथा सुनावे के । का सुनाईं किताब का सोझा ।। राम मुँह में बगल में छूरी बा । धर्म आइल खिजाब का सोझा ।। ठाढ़ मंदिर बा आज मस्जिद बा। कुर्सी मार्का तिजाब का सोझा ।। मोल जौहर गजल के लागी नू । आई एक दिन हिसाब का सोझा ।।

दोहा-गजल

दिल के अंदर चोर बा,मुँह पर बा मुस्कान । ओढ़ के चोला संत के, घूमत बा शैतान ।। उजड़ल खोंता सामने, अंडा पर बा साँप । सारा चकनाचूर बा पंछी,केअरमान।। लौट के पंछी आ गइल,होखत बा गदबेर । ई सुख ऊ ना पा सकी, ह्रदयहीन-विरान ।। आँखिन में उमीदो के,सिसकत बा अरमान, धरती पर बा स्वार्थ के, बारूदी तूफान ।। के विपदा में बा घिरल, कब सोंची इंसान । मानवता के नाम पर,राखी मान-गुमान ।। आँखिन में उमीदो के,सिसकत बा अरमान। नीति,घर्म कहाँ गइल, जौहर के ईमान।।

गजल

सब फूल हमरा गाँव के काहे उदास बा। जब रामआ रहीमो के इहवाँ निवास बा।। सब कुछ हेरा गइल बा जिनिगी केभीड़ में, के हाल-चाल पूछी अब केकरा सवांस बा । विश्वास घात हमरा से,के ना भला कइल, ई भाग बा हमार, की फूटल गिलास बा । मन ना रंगा के गाँव के चोला रँगा गइल, मिथ्या के चारुओर अब जीयत पियास बा। गपरे-गतर छलावा आ घाती जेकर नजर, ओकरो वचन में देख लीं कतना मिठास बा। आपन पता ना आज ले जौहर का चल सकल, पूछत बा लोग हमरा से कहवाँ निवास बा।

गजल

कहाँ पूरा-पूरी ई खत्म होई,जिन्दगी तय बा । भला जाई कहाँ सूरज से हट के,रौशनी,तय बा ।। अन्हरिया रात लम्बा चाहे,जतना भी घना होखे। फजिर होई चढ़ी सूरज,उजाला ताज़गी तय बा।। कठिन मेहनत के दुख का कोख,से निकलेला सुख-सागर। समय साधक के ना छोड़े,खुशी के चाँदनी,तय बा ।। कबो भगवान बन जाला,कबो शैतान क्षण भर में। महाभारत ओरइलो पर, रही ई आदमी,तय बा ।। बनावट मोह-माया के, भरम जंजाल से निकलीं । केहू के साथ ना देले,समय के उर्वशी तय बा ।। गजल जौहर के जिनगी हs,गजल जिनगी के हs जौहर। जगत में प्रेम के बाजत रही,ई डुग-डुगी तय बा ।।

गजल

चाननी बनके पसर जा तू गजल होखे द। आज के साँझ ठहर जा तू गजल होखे द।। फूल कुछ याद का बगिया में खिलल बाअचके। बनके खुशबू ना बिखर जा तू गजल होखे द।। मन के मंदिर में उदासी ना सहाई हमरा । आज नस-नस में उतर जा तू गजल होखे द।। पूछ के थाहो-पता जन तू समय नष्ट करs । बनके बनजारा लहर जा तू गजल होखे द।। जब विचारन के सजावट में बा दर्पण साखी। माँग रचन के ना भर जा तू गजल होखे द।। अंश से पूर्ण ले जौहर बा समय के पहरा । आव$ना मिल के निखर जा तू गजल होखे द।।

गजल

तन के तितली प मखमल के पर्दा लगे। मन के पंछी प कवनो ना पहरा लगे ।। प्यार पावल बड़ा भाग्य के बात ह । रूप आ रंग सारा ककहरा लगे ।। बात अइसन करSकी हुलस जाये मन । नीक हमरा लगे, नीक तहरा लगे ।। प्रेम में चोट लागेला लगबे करी । चाहे हमरा लगे चाहे तहरा लगे ।। सुना-सुना महल मन के तोहरा बिना । सून सपना के एहवात अँचरा लगे ।। हमरा पासे ए जौहर बा का अब बँचल। कुछ जो होखे त आपुस में बखरा लगे ।।

गजल

इतिहास साधना के जोगाईं पुकार दीं । मजधार में बा नावअबआईं सम्हार दीं ।। राउर स्नेह पा के भइल बा की का करीं । धरती प आज चान आ सूरूज उतार दीं ।। हमरा कहे-सुने के बा ऊ हम कहब-सुनब । राउर जवन विचार बा आके विचार दीं ।। आदर से अपना भाव के राखी ले हम भरम। कइसे कहीं ना, फूल के लाते कचार दीं ।। इज्जत जोगवले बानी हम रउवा जे अब करीं । खूँटी में टाँग दीं, भले बहरा पसार दीं । मिथ्या के एह बाजार में जौहर जी जन पड़ीं । दर्पण बनीं सनेह के चेहरा निखार दीं ।।

दोहा-गजल

झूठ-साँच सब एक भइल, बाटे बाबू देख। झूठे आगे आ गइल, बाटे बाबू देख ।। नैतिकता के बेंच के, भोगत बाटे राज । मानवता शरमा गइल, बाटे बाबू देख ।। जोगी-भोगी बा बनल, आ मुल्ला बटमार । सब पर कलयुग छा गइल, बाटे बाबू देख ।। मजहब-धरम अफीम हs, बा इहो कहनाम । सच्चाई चकमा गइल, बाटे बाबू देख ।। नया मजहबs, धर्म के, स्वारथ सिरजे रूप। जागल मन थर्रा गइल, बाटे बाबू देख ।। जौहर दरिया आग के, जामे बासे साँच । डूब गइल से पा गइल, बाटे बाबू देख ।।

ग़ज़ल

ई चुप्पी बा जे, से तुफान के बा । हिया के विप्लवी अरमान के बा ।। कबूतर का तरे मूड़ी लुका के । समुझ लेलs हिफाजत जान के बा ।। भुला आखिर गइल सेखी त तोहरो । बतावs अब इहाँ तू, बलवान के बा ।। मिटावल चाहता ऊ नाम ले अब । लड़ाई हमरा ई पहचान के बा ।। धर्म-मजहब से बढ़के बाटे पइसा । सुरूज के बा, बतावs चान के बा? लगा के आग जे घूमत बा जौहर। पुजारी राम के, रहमान के बा ।।

गजल

केहू हँस रहल बा केहू रो रहल बा । बताव ना विधना, ई का हो रहल बा ।। घटा, फूल, पनघट बसंती हवा में । केहू रंग लेता, केहू टो रहल बा ।। करम-भागो के थाह अबले ना लागल । केहू पा रहल बा, केहू खो रहल बा ।। सभे काल करूणा के तट पर खड़ा बा । उहे लोग काटत बा, जे बो रहल बा ।। मजा बा जिनिगिया लुटावे में जौहर । केहू जी रहल बा, केहू ढो रहल बा । ।

गजल

जे चाहीं रउवा छीन लीं,पहुंचा मरोड़ के । बाकी ई आग सुनुगी त जाई ना छोड़ के ।। संतोष हम करीले दिलासा के बा लकम । अँजुरी में अपना आँख के मोती बटोर के ।। जनता से दूर ताजमहल के कानून बा । रउवे बताईं, चोर सहेला अँजोर के ? कुर्सी के लोभ नाच रहल बाटे रोड पर । जागत बा गाँव रात भर टोला अगोर के ।। गजरा के बा गमक ना,कजरा कटार बा । लिख द गजल करेज के,कनखा खँखोर के ।। जौहर डड़ेर खेत के कचरत बा पान जस । का साँच में बा आँच कहीं हाथ जोड़ के ।।

गजल

उमड़ल प्यार चढ़ल यौवन में । बरबस टेर बजे चितवन में ।। धीरज के बा बान्हो टूटत । आग कहीं लागल चन्दन में ।। सुन्दर रूप अनूप के शोभा । अचके बा गमकल मधुबन में ।। हेरत-हेरत हेहर भइनीं । रूप-नगर बन-बन उपवन में ।। मन-मंदिर के आसे तुलसी । आज अमाइल बा नयनन में ।। जौहर प्रीतो रीत न जाने । का बरसल तन-मन आंगन में ।।

सवैया गजल

जन-जन में भरल चहू ओर सजी, अपराध रूची अति घातक बा । अगड़ी, पिछड़ी भर गाँव भइल, पावन जस लागत पातक बा । नेता के कवन नीति से गरज, कलयुग के इहे राजनीति भइल । जे भ्रष्ट बा आज बड़ा जेतना, ओतने ऊ बड़ा जननायक बा । घनघोर घटा निज स्वारथ के, उमड़ी-घुमड़ी चहूँओर घिरल। दिन-रात अमावस जस लागे, असरा के धुँआइल दीपक बा ।। कवने-कवने ना ठौर गइल, कत ठौर प हाथ ना पसरल बा । सब ठौर अभाव के भाव मिलल, हर द्वार प लागल फाटक बा । बा देश के हाल बेहाल भइल, कुछुओ ना सही शुभ लउकत बा । कवनो तनी ज्ञान न बा जेकरा, ऊ आज समाज-सुधारक बा । नाचत बा सभे बन-बानर बन, नटराजन के ता-ता सम पर । सपना बा भइल माटी के कथा, मतलब के सभे अब वाचक बा । अँखिया से गइल निदिया जौहर, सुख-चैन पराइल बा कब से । एह राज सुराज में आरक्षण, कुर्सी के बनावल नाटक बा ।

गजल

नदिया के ओह पार कबिरा । चल देखे संसार कबिरा ।। जीत जहाँ घपला के होता, नैतिकता के हार कबिरा । जहवाँ सड़क से संसद तक, सच्चाई लाचार कबिरा । दर-दर नेत जहाँ बा भटकत, मानवता बीमार कबिरा। रोज बिकाता थोके भावे, अपनन के व्यवहार कबिरा । रंग देखाई आपन कहियो।, गरिबन के चितकार कबिरा। जौहर साँच धरम के अतने, परहित आ उपकार कबिरा ।

गजल

का कहीं कब भइल,भइल ना भइल । बात का तब भइल,भइल ना भइल।। जिन्दगी चारे दिन के मेहमान बा, पाँच दिन जे भइल, भइल ना भइल। हाथ से बा गइल बाटे के साथ में, साफ का छब भइल, भइल ना भइल । साँच हमरो सुझल बहुत बाद में, सामना जब भइल,भइल ना भइल । भूल आपन सुझल चलीं ठीक बा, चोख आ दब भइल, भइल ना भइल । बात जौहर कहे गजल गीत में, अबले कुछ ढब भइल, भइल ना भइल ।

गजल

देश में प्रेम के माहौल बना के खेलs। संस्कारो तनी ना यार बचा के खेलs।। साँच के गाँव में,अब झूठ के खेती होता, आग इतिहास के मंडी में लगा के खेलs । घात खेले के बा तब,देश से मतलब का बा, प्रेम के राह में बारूद बिछा के खेलs । आड़ में धर्म आ मजहब के बना के चिरकुट, भाई-भाई के तू बे बात लड़ा के खेलs । माफ ना कर सकी ई देश समय आवे दs, आज तू मान आ सम्मान घटा के खेलs । साँच अतने बा कि परहित ह धरम के जौहर, प्रीत के रीत मोहब्बत के जगा के खेलs ।

ग़ज़ल

रूप सूरूज मयाब का सोझा । मुखड़ा राउर गुलाब का सोझा ।। देतीं उपमा अगर मीलित हमरा, आईं रउवे जवाब का सोझा । मन बा चाहत कथा सुनावे के, का सुनाईं किताब का सोझा । राम मुँह में, बगल में छूरी बा, धर्म आइल खिजाब का सोझा । ठाढ़ मंदिर बा, आज मस्जिद बा, कुर्सी मार्का तिजाब का सोझा । मोल जौहर गजल के लागी नू, आई एक दिन हिसाब का सोझा ।

दोहा मुसलसल गजल

बहुते दामिल फूल बा,ई जिनगी क पल-पल । दिन --दिन रोज खिसक रहल,हाथ केअमरित फल ।। समय बड़ा बलवान ह$,बाबू देख सम्भल । बहुते... ।। शाह जहाँनी ताज के, दर्शन मत कर चल । अपने हाथे तू बना, आपन ताजो महल ।। आज नया इतिहास रच, बाबू सोंच$बदल। बहुते... ।। बिन मतलब के बा धुआँ, बिनू पानी बादल । करनी के सब खेल बा, जीवन-मरनs सफल ।। बिधना के कानून बा, पक्का, खाँटी, अटल । बहुते................................... ।। जीवन के रस राग से, लड़ जोगी मत भाग । मुक्ति के बा खोज तब, गा बंजारी राग ।। लालच मोह क जाल से, जल्दी भागs निकल । बहुते.......................................... ।। मानवता के रंग में, रंगले मन के फूल । कर्म योग से मिट जाला, पापन के जड़ मूल ।। बहत नदी के होला जस, जल शीतलोे-निर्मल। बहुते .......................................।। अब तन-मन रखs आत्मा, चिन्तापन से दूर । बिनू माँगे परमात्मा, देलन लूर-सहूर ।। जीवन तब तक बा सफल, जब तले बाटे बल । बहुते................................ ।। बरसी घटा यौवन के, झूम के बरसी रंग । कतना बा अब देखलीं, गजल बान्हे के ढंग ।। जौहर गजल के नाजुकी, नित नव मूले गजल । बहुते................................. ।।

गजल

जिनगी के इतबार कहानी । युग दर्पण के सार कहानी ।। आज गढ़ाता यार कहानी । सत्ता के उपहार कहानी ।। नैतिकता के नाम से होला, सपना के श्रृंगार कहानी । मानवता के नाम धरम हs, परहित के उजियार कहानी । मंदिर-मस्जिद देश से बड़का, बुरबक के हथियार कहानी । डिग्री के इतिहास बा आपन, रट-रूट के दू-चार कहानी । दर्पण बनके बोल रहल बा, जौहर के घर-बार कहानी ।

गजल

अनबनी में अपनो घर कइसे फूँकाता देखलीं। फूल से फल से लदल गछिया कटाता देखलीं। । औने-पौने में बिकाता अब इहाँ कुछ आदमी, जे करे धोखाधरी अच्छा कहाता देखलीं । साधु अनशन में मरल गंगा छछन के रो पड़ल, देशभक्ति के नया सीमा खींचाता देखलीं । सामने बा लोभ-अहंकार के अब आदमी, राड़ के परचा इहाँ हर दिन बटाता देखलीं । मोल-मर्यादा गवाँ के लोग बोलत बा इहाँ, झूठअब साँचे नियर फरहर बुझाता देखलीं । खो गइल जौहर कहीं संवेदना बा आज-काल्ह, कुछ रोपाता, कुछ कहाता,कुछ सुनाता देखलीं ।

सपना

कब आई हमरा गँउवा में, प्रेम किरण मुस्काई । भरम जाल के तूर-तार के, साँच तराना गाई । धरम कहीं कि भरम कहीं, कुछुओ ना आज बुझाता । जवने खातिर धरम बनल, ओकरे के जारल जाता । बोलs सत्ता भाग्य विधाता, तूँ आउरी का खइबs ? राम-कृष्ण आ पैगम्बर के, केतना आउर भँजइब ? साँई आ कबीर के डसलs, पेन्ह के लमहर चोला । सोंचs ना रतिया का पाछे, दिन के पहरा होला । माफ करी इतिहास ना बबुआ, एक दिन तूँ पछतइबs । चढ़ल बाड़s आकाश में तूँ, कहियो धरती पर अइबs ।

गजल

जे चाहीं रउवा छीन लीं,पहुंचा मरोड़ के । बाकी ई आग सुनुगी त जाई ना छोड़ के ।। संतोष हम करीले दिलासा के बा लकम । अँजुरी में अपना आँख के मोती बटोर के ।। जनता से दूर ताजमहल के कानून बा । रउवे बताईं, चोर सहेला अँजोर के ? कुर्सी के लोभ नाच रहल बाटे रोड पर । जागत बा गाँव रात भर टोला अगोर के ।। गजरा के बा गमक ना,कजरा कटार बा । लिख द गजल करेज के,कनखा खँखोर के ।। जौहर डड़ेर खेत के कचरत बा पान जस । का साँच में बा आँच कहीं हाथ जोड़ के ।।

गजल

खुलेआम दिन-रात बिकाता,ई का होता । महंगा सस्ता बात बिकाता,ई का होता ।। प्रजातंत्र के मोल गवा के,छी-छी, थू-थू । धरम आ देखीं जात बिकाता,ई का होता ।। कहाँ सपना बापू के पुरल कवनो,बोलीं ना ? उनके नाम से घात बिकाता,ई का होता ? कहाँ बा आपन देश खड़ा,बतलाईं ना कुछ । महंगा नूनो-भात बिकाता ,ई का होता ? मरत बा किसानों भूख से,अब देखीं ना ई । सुखारो में बरसात बिकाता ,ई का होता? सत्ता के बा बाजार गरम तब,सोंची ना कुछ । अबो थाती सौगात बिकाता ,ई का होता ?

गजल

प्रीत के ई बात ह$त$का कहीं। तोहरे ई घात ह$त$ का कहीं ।। हमरा सोझा रात के पसरल अन्हार, तोहरा नजरी प्रात ह$त$ का कहीं । सब जगे बा नेह के चर्चा भइल , ई महज शुरूआत ह$त$का कहीं। साँच सब से बा कहल बड़का कठिन, का कहीं ई रात ह$ त$ का कहीं । बा, कहाँ जौहर का मन में लोभ-मोह, बस इहे सौगात ह$ त$ का कहीं ।

गजल

पावन मन जग-मग दर्पण कर। साँच कहे के ऊँचा फन कर ।। तन-मन में विश्वास जगा के, आशा के उजियार गगन कर । अँधियारो से टक्कर खातिर , अपना के तइयार मगन कर । अँखियन से सावन घन बरिसे , भावन के व्यवहार सधन कर । मिथ्या के बाजार गरम बा, तू तुलना अपने आपन कर । जौहर एक दिन भीड़ में घुस के, अनुभव के कुछ गोट रतन कर ।

ग़ज़ल

हवा में लोग कुछ रहने लगे हैं । समंदर को नदी कहने लगे हैं ।। भरोसे का किया है ख़ून जिसने, उसी की बांह अब गहने लगे हैं । सम्मुख-तूफान से लड़ते थे कल जो, नदी की धार में बहने लगे हैं । महाभारत के जो साखी बने थे, वही अब ज़ुल्म को सहने लगे हैं। चलो मौजों से खेलें आज हम भी, समझ के साथ कुछ कहने लगे हैं । क़िला धर्मों के भी सत्ता की खा़तिर, अजब अंदाज़ से ढहने लगे हैं । लड़ाने पर तुले हैं लोग जौहर, गरल अमृत में भी महने लगे हैं ।

गजल

नदी में हर तरफ खलबल बुझाता। मछरियन में बड़ा हलचल बुझाता।। शिकारी जाल लेके घात में बा, समय के ताक में चंचल बुझाता। लड़ा के माल चापत बा मजा से, छली बस रूप से निश्छल बुझाता । समुंदर पी गइल रखवार बनके, तबो देखीं सभे निर्जल बुझाता। भरम में बा अबो लबरा शिकारी, कहाँ केहू के ई कल-बल बुझाता? समय के साँच बा जौहर इहे अब, कहीं का बोरा के,मखमल बुझाता?

गजल

लड़ाई हक के बा अपना, जतावल भी जरूरी बा । बतावल भी जरूरी बा, बुझावल भी जरूरी बा ।। कबो ई साँप बहिरा ना सुनी कवनो मधुर भाषा, कड़क छिंउकी आ पैना से जगावल भी जरूरी बा । खड़ा तूफान में होके बचावे के पड़ी टोपी, घड़ी भर माथ के अपना झुकावल भी जरूरी बा । सही अक्षर के खातिर मश्क करहीं के पड़ी बाबू, बनावल भी जरूरी बा, मिटावल भी जरूरी बा । बतावत बा इहे दर्शन से दर्शन जिंदगानी के, उगावे खातिर अपना के, डूबावल भी जरूरी बा । कबो जौहर ना देखस कोरा सपना जब दिन में कवनो, एही से आज उनका के घटावल भी जरूरी बा ।

गजल

अनबनी में अपनो घर कइसे फूँकाता देखलीं। फूल से फल से लदल गछिया कटाता देखलीं। । औने-पौने में बिकाता अब इहाँ कुछ आदमी, जे करे धोखाधरी अच्छा कहाता देखलीं । साधु अनशन में मरल गंगा छछन के रो पड़ल, देशभक्ति के नया सीमा खींचाता देखलीं । सामने बा लोभ-अहंकार के अब आदमी, राड़ के परचा इहाँ हर दिन बटाता देखलीं । मोल-मर्यादा गवाँ के लोग बोलत बा इहाँ, झूठअब साँचे नियर फरहर बुझाता देखलीं । खो गइल जौहर कहीं संवेदना बा आज-काल्ह, कुछ रोपाता, कुछ कहाता,कुछ सुनाता देखलीं ।

गजल

जे चाहीं रउवा छीन लीं,पहुंचा मरोड़ के । बाकी ई आग सुनुगी त जाई ना छोड़ के ।। संतोष हम करीले दिलासा के बा लकम । अँजुरी में अपना आँख के मोती बटोर के ।। जनता से दूर ताजमहल के कानून बा । रउवे बताईं, चोर सहेला अँजोर के ? कुर्सी के लोभ नाच रहल बाटे रोड पर । जागत बा गाँव रात भर टोला अगोर के ।। गजरा के बा गमक ना,कजरा कटार बा । लिख द गजल करेज के,कनखा खँखोर के ।। जौहर डड़ेर खेत के कचरत बा पान जस । का साँच में बा आँच कहीं हाथ जोड़ के ।।

गजल

सड़ गइल पानी नदी के, के कही ? साँच ई नइकी सदी के, के कही ? हाँ कही, डट के कही, जनता सजी, तब समय के चौहदी के, के कही ? आज के ई खेल सारा देख के, बात अब नेकी-बदी के, के कही ? नाम पर मजहब-धरम के गेम बा, भेद ई लादा-लदी के, के कही? बन गइल लबरा चलीसा राज, झूठ खनदानी जदी के, के कही ? बस इहे जौहर दशा बा देश के, अब सुदी केआ बदी के,के कही ?

गजल

का भइल कब भइल,भइल ना भइल । जब भइल तब भइल,भइल ना भइल।। जिन्दगी चारे दिन के मेहमान बा, पाँच दिन जे भइल, भइल ना भइल। हाथ से बा गइल बाटे के साथ में, साफ का छब भइल, भइल ना भइल । साँच हमरो सुझल बहुत बाद में, सामना जब भइल,भइल ना भइल । भूल आपन सुझल चलीं ठीक बा, चोख आ दब भइल, भइल ना भइल । बात जौहर कहे गजल गीत में, अबले कुछ ढब भइल, भइल ना भइल ।

गजल

उर्दू के मशहूर शायर फैज़ अहम्मद फैज़ के ज़मीन पर भोजपुरी गज़ल के रंग । 212 +4=बहरे मुतदारिक ) चाँदनी गुद-गुदावत रहल रात भर । आग मन में लगावत रहल रात भर ।। साँच जिनगी के कजरारी अँखियन में बा । याद जादू जगावत रहल रात भर ।। कोरा सपना नयनवा में लचकत रहल, नेह बेना डोलावत रहल रात भर । लोर अँखियन में आ-आ के ठमकत रहल, लाज पपनी बचावत रहल रात भर । गीत कविता गजल चाह का दाह में, आस गावत-बजावत रहल रात भर । लाख सपना में अपना के जौहर लखे, नाच मिथ्या नचावत रहल रात भर ।

गजल

सालत बाटे प्यार के बतिया । जिनगी का उपहार के बतिया ।। अखड़त बाटे रह- रह के मन में, उनका अब उपकार के बतिया । भूली गइल ,ऊ बारें शायद, का होला व्यवहार के बतिया । सबका में ई बात ना होला, गाँठे -राखे यार के बतिया । मनवा में जग-मग बा अबले सब, सपना के उजियार के बतिया । जौहर नेहो - स्नेह में सगरी , होखत बा दूधार के बतिया ।

गजल

छन-छन के बनल-बिगड़ल, टाँकल बा हथेली पर । आवेले हँसी हमरा, जिनगी का पहेली पर ।। शुभ याद के परिछाहीं, सुसुकेले अँगनवा में । जब चाँदनी उतरेले, सुनसान हवेली पर ।। जीअत आ मुअत खाता, लागत बा कि बेटहा ह । जे गाँव का तरकुल का, बइठल बा मथेली पर ।। अब विधने भरम राखस, चुटकी भ सेनुरवा के । धड़कत बा करेजा की, गुजरल का सहेली पर ।। जिनगी का अन्हरिया में, कइसन ई अँजोरिया ह । बा नाम लिखल कवनो, मनरूप चमेली पर ।। जौहर जे निखरले बा, निअरे से जिनिगिया के । विश्वास करी ऊ का, माया के बहेली पर ।।

गजल

नजर से बढ़ के हिया में उतर के बात करीं । बइठ के नाव में का जल भीतर के बात करीं ।। समय का रेस में धउरीं तबो समुझ राखीं । कहाँ बा आदमी ढाई अक्षर के बात करीं ।। उड़ा के ऐटमी हथियार रउवा खुश बानीं । करीं ना लाज-शरम के नजर के बात करीं ।। सुनाईं चाँद पर गइला के सब कथा, बाकी । दशा खराब बा अपना नगर के बात करीं ।। सभे बा साँच से भागत टँगा के खूँटी में । कहे में साँच का जौहर लचर के बात करीं ।।

ग़ज़ल

भोरे-भोरे पढ़ीं अखबार के रोना रोईं । जिंदगी दर्द के अम्बार के रोना रोईं ।। एटमी आज के हथियार के रोना रोईं । रउवा रोइले भले प्यार के रोना रोईं ।। माँझी बुद्धि के जे पतवार उड़ावेला कबो । दिल के नइया कबो मझधार के रोना रोईं ।। जब विचारन के उड़ेला कबो जुगनू उपर । अब के इंसान के इतबार के रोना रोईं ।। अब कहाँ कवनो गतर चोट से खाली बाटे । हीत-नाता कबो घर-बार के रोना रोईं ।। हीत मुदई में स्वारथ के बा अन्तर जौहर । रोईं एह पार कि ओह पार के रोना रोईं ।।

ग़ज़ल

क्रोधी जीवन अनबन-अनबन । खाली बर्तन खन-खन, खन-खन ।। दुख-सुख के रुत जानीं परखीं, पतझर आ मनभावन-सावन । पीड़ा केहू के ना छोड़े, हो जाला चट आनन-फानन । तड़पत लइका भूखा नंगा, कपड़ा-लत्ता राशन-वासन । पैदा होते रोजी-रोटी, का निर्धन के बचपन-यौवन । जौहर अपनों में ना झाँकी, लालच बाटे काहे टन-मन ।

ग़ज़ल

आपा में जब रार ठनेले। तब जाके कुछ बात बनेला।। सुझ-बुझ बिन निकसार कहाँ बा, अपनन के कुछ घात खलेला । केहू पर विश्वास करे में, कतना मन में बात चलेला । मजदूरन के खून- पसेना, बनके फल आ फूल झरेला। बटमारन के राज में कहवाँ, मानवता के जोत जरेला । जौहर का पत-रंगमहल में , नेह के सपना साध रहेला ।

गजल

वादा के ललकार विचारीं। अब कवनो उपचार विचारीं ।। जिनगी के दिनचार विचारीं। अँधियारो उजियार विचारीं ।। स्वार्थ के फूफकार उठत बा, कुछ अबहूँ सरकार विचारीं । रउवा झूठे बोईं आ काटी, बोलीं का हम यार विचारीं । नइयाा बा अब बीच भवर में, कइसे लागी पार विचारीं । का होला विश्वास पता बा, कुछ अपनो व्यवहार विचारीं । साँचों में अब आँच बहुत बा, जौहर के चितकार विचारीं ।

गजल

दर्द फुनगी प जाके सुघर हो गइल । गीत, कविता, गजल आ झूमर हो गइल ।। जब से झाँपी में साधन के नागिन घुसल । आसरा के भयावन डगर हो गइल ।। मनवा मरुआ गइल मोह का मेह पर । हमरो टिसुना टटा के टुअर हो गइल ।। नइखे आवत पकड़ में कवन रोग बा । कुल्ह दवा-दारू बा बेअसर हो गइल ।। हमरो उतजोग सूझल सहज बाछ के । हमरा उनका से जब ठेहुना भर हो गइल ।। दाग काहे के धोईं लुकाईं का हम । जब चुनरिया सुराजी खदर हो गइल ।। काल का गाल में काल्ह कचनार के । रउवा जौहर जी कइसे खबर हो गइल ।।

ग़ज़ल

सालत बाटे प्यार के बतिया । जिनगी का उपहार के बतिया ।। अखड़त बाटे रह- रह के मन में, उनका अब उपकार के बतिया । भूली गइल ,ऊ बारें शायद, का होला व्यवहार के बतिया । सबका में ई बात ना होला, गाँठे -राखे यार के बतिया । मनवा में जग-मग बा अबले सब, सपना के उजियार के बतिया । जौहर नेहो - स्नेह में सगरी , होखत बा दूधार के बतिया ।

ग़ज़ल

तहरा से का बात भइल बा। सावन के बरसात भइल बा ।। तन-मन में अब मेल न बाटे, दिन अबला के रात भइल बा । जिनगी के इतिहास बा अतने, यादन के बारात भइल बा । देखी के हंसले बाटे केहू , बे बाते के ,बात भइल बा । रउवा रोईं ,भाग ठेठाईं, हमरो साथे घात भइल बा। जौहर का अनका के हंसस, नहला-दहला काँत भइल बा।

ग़ज़ल

सालत बाटे प्यार के बतिया । जिनगी का उपहार के बतिया ।। अखड़त बाटे रह- रह के मन में, उनका अब व्यवहार के बतिया । भूलो गइल ,ऊ बारें शायद, का होला उपकार के बतिया । सबका में ई बात ना होला, गाँठे -राखे यार के बतिया । मनवा में जग-मग बा अबले सब, सपना के उजियार के बतिया । जौहर नेहो - स्नेह में सगरी , होखत बा दूधार के बतिया ।

गजल

दरद जिन्दगी के सजा देले बानीं। हँसी उम्र भर के भुला देले बानी ।। बा हमरा लकम चोट खाये, सहे के । हथेली से तितली उड़ा देले बानी ।। कहाँ एको इंसान लउकत बा सोझा । नजर से पर्दा हटा देले बानीं ।। बहुत रंग बा भोजपुरी गजल में । दिआ साधना के जरा देले बानी ।। घटा, फूल, पनघट बसंती हवा में । कजरवा के बदरा बना देले बानी ।। बुता देला जे आग मन के ए जौहर । उहे आग दिल में लगा देले बानीं ।।

ग़ज़ल

जेकरा मन में प्यास रहेला । ओकरे नू कुछ आस रहेला ।। ऊ दोसरा के हीन ना समझे । जेकरा में कुछ खास रहेला ।। देखेला सब लोग ओही के । जे हर जन के पास रहेला ।। सारा जग अपने जस लागे । जब मन में विश्वास रहेला ।। जहवाँ नेह दया, करुणा बा । उहवें जौहर दास रहेला ।।

ग़ज़ल

दरद जिन्दगी के सजा देले बानीं। हँसी उम्र भर के भुला देले बानी ।। बा हमरा लकम चोट खाये, सहे के । हथेली से तितली उड़ा देले बानी ।। कहाँ एको इंसान लउकत बा सोझा । नजर से पर्दा हटा देले बानीं ।। बहुत रंग बा भोजपुरी गजल में । दिआ साधना के जरा देले बानी ।। घटा, फूल, पनघट बसंती हवा में । कजरवा के बदरा बना देले बानी ।। बुता देला जे आग मन के ए जौहर । उहे आग दिल में लगा देले बानीं ।।

ग़ज़ल

जेकरा मन में प्यास रहेला । ओकरे नू कुछ आस रहेला ।। ऊ दोसरा के हीन ना समझे । जेकरा में कुछ खास रहेला ।। देखेला सब लोग ओही के । जे हर जन के पास रहेला ।। सारा जग अपने जस लागे । जब मन में विश्वास रहेला ।। जहवाँ नेह दया, करुणा बा । उहवें जौहर दास रहेला ।।

ग़ज़ल

उमड़ल घटा के धार बा, हम का गजल कहीं । मुर्छित भइल बहार बा, हम का गजल कहीं ।। पँखुरी गुलाब के कहीं, कि ठोर हम कहीं । असमन कमल उतार बा, हम का गजल कहीं ।। बा फूल अंग-अंग त, मुखड़ा बा चाँद पर । कजरा बनल कटार बा, हम का गजल कहीं ।। तुलसी, कबीर, जायसी, आ कालिदास के । एक-जुट भइल श्रृंगार बा, हम का गजल कहीं ।। अँगना में चाँद आके, उदासी लुटा गइल । भगिये भइल उलार बा, हम का गजल कहीं ।। जौहर जी उनका बात के, का फुलझड़ी कहीं । सावन के रस फुहार बा, हम का गजल कहीं ।।

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Baridi

Khwaja Mohammad Imamuddin Nizami reverently known as Dr. Jauhar Shafiyabadi. Dr. Jauhar Shafiyabadi got his ‘Takhallus’ or pen name ‘Jauhar’ (Jauhar means ‘Talent/Skill/Art’) by his Peer-o-Mursheed or spiritual master .