Likes & Share


NaatSharif

नात

ज़िक्रे नबी की बज़्म सजाए ,वह भी इतनी रात गए। नैनन से मोती बरसाये ,वह भी इतनी रात गए ।। तन-मन धन सब उन पर वारूँ,निशदिन उनके राह निहारूँ, बेकल मनवा चैन न पाये, वह भी इतनी रात गए । इश्क़ को क्या समझा क्या जाना,मुश्किल है मैने भी माना, लेकिन जब सांसों में आये,वह भी इतनी रात गए। जाने कब सरकार बुलायें,मेरे मन की प्यास बुझायें, विरहा बैरी आग लगाये ,वह भी इतनी रात गए। जौहर वैसो बेलाल की बातें,इश्क़ में तपती रात की रातें, कोइलिया कुहुके,कुहकाये वह भी इतनी रात गए ।

नात

सोकुँ बख़्शे दिले हर नातवाँ है । नबी का नाम योँ विरदे ज़बाँ है ।। जबीं अपनी है उनका आस्ताँ है, ज़मीं के दू ब दू अब आसमाँ है । फराज़े अर्शो कुर्सी से गुज़र कर, नबी का हुस्न हुस्ने ला मकाँ है । वह बख्शें सायये दामाने रहमत , यही एक आरज़ू दिल में नेहाँ है । मोअत्तर है हर एक ज़र्रा यहाँ का, मदीना है के गुलज़ारे जेनाँ है । ब - फैज़े हज़रते हस्सान शाहा, दिले जौहर भी तेरा मदहखा़ँ है ।

नाते-पाक

सोकुँ बख़्शे दिले हर नातवाँ है। नबी का नाम योँ विरदे ज़बाँ है ।। जबीँ अपनी है उनका आस्ताँ है। ज़मी के दूबदू अब आसमाँ है।। फराज़े अर्शो कुर्सी से गुज़र कर, नबी का हुस्न हुस्ने ला मकाँ है । वह बख़्शें साय्ये दामाने रहमत, यही एक आरज़ू दिल में नेहाँ है। मोअत्तर है हर एक ज़र्रा यहाँ का, मदीना है , के गुलज़ारे जेनाँ है । ब फैज़े हज़रते हस्सान शाहा , दिले जौहर भी तेरा मदहखा़ँ है।

नाते- पाक

खड़े हैं फरिश्ते क़रीने के अन्दर । मदीने के बाहर मदीने के अन्दर ।। हबीबे ख़ुदा की मुहब्बत है शाहिद, बहुत कुछ है दिल के दफीने के अंदर। मुझे देखकर रुख़ को मौजों ने फेरा, वह तूफाँ है मेरे सफीने के अंदर । तेरी याद है और है क़लबे सादिक़, नगीना हो जइसे नगिने के अन्दर । बहारे चमन हो गई ,पानी-पानी, वह खुशबू है उनके पसीने के अंदर। जो मिल जाए तो दिल की दुनिया बदल दे, वह जौहर है इस आबगिने के अन्दर ।

नाते-पाक

जलवा देखूँ कभी उनका कभी चेहरा देखूँ । दिदये -शौक़ बता तुही मैं क्या-क्या देखूँ ।। या ख़ुदा बस ये तमन्ना है हमेशा देखूँ । हुस्ने पर्दा भी रहे और बे पर्दा देखूँ ।। पुरी कब होती है अपनी ये तमन्ना देखूँ । सबज़े गुम्बद के क़रीं जाके उजाला देखूँ।। अपनी आँखों में इलाही वह बसीरत दे दे, देखना चाहूँ तो मैं अर्शे मुअल्ला देखूँ । जिनको जाना था गये जायेंगे जाने वाले, जाने कब आता है जाने का बुलावा देखूँ । हश्र में प्यास की शिद्दत जो बढ़े तो जौहर, हाथ में साक़ीये - कौसर के प्याला देखूँ । या इलाही रहे महफूज़ ये जौहर हरदम, सीरते सैय्यदे आलम का नमूना देखूं ।

नाते-पाक

बख़्ते ख़ाबिदा मेरा बेदार होना चाहिए । ख़्वाब ही में हो सही दिदार होना चाहिए ।। नामे सरकारे दो आलम सुन के मौजों ने कहा, इस मुसाफ़िर का तो बेड़ा पार होना चाहिए । हो ज़बाँ पर नामे पाके हज़रते सिमना जनाब, और रज़ा का हाथ में हथियार होना चाहिए । कह दिया किसने के दरबारे मदिना दूर है, बस जमाले सैय्यदे अबरार होना चाहिए । जिसको मैदाने क़यामत कह रहे हैं सब के सब, नाम उसका मुस्तफा बाज़ार हो ना चाहिए । बैठते उठते उन्हीं का ज़िक्र हो जौहर मियाँ, ईश्क़ है तो ईश्क़ का इज़हार होना चाहिए ।

नाते-पाक

ज़बाँ पर नाम जब आया तुम्हारा,या रसूल्ललाह। दिया तूफाँ ने घबड़ा कर सहारा,या रसूल्ललाह।। न पाएगा अगर तेरा सहारा,या रसूल्ललाह। कहाँ जाएगाअब ये ग़म का मारा,या रसूल्ललाह।। ख़ुदा शाहिद वहआजाते हैं दम में दसतगिरी को, जहाँ दिल से किसी ने भी पुकारा,या रसूल्ललाह। तेरी अज़मत,तेरी शौकत,तेरी रिफअत,की मिदहत से, नहीं ख़ाली कोई कुर्आँ का पारा,या रसूल्ललाह। तलातुम ख़ेज़ मौजों में तुम्हारा नाम लेते हीं, नज़र आनेे लगा हरसू किनारा,या रसूल्ललाह। नज़ा मे कब्र में महशर में मिज़ानेअदालत पर, तुमहीं हो बे सहारों के सहारा,या रसूल्ललाह। तुम्हारा नाम लेवा है, तुम्हारा दिल से शैदा है, चमक जाए न क्यों जौहर तुम्हारा,या रसूल्लला।

नाते-पाक

मेरी आँखों में जब से आपकी सूरत समाई है । बेहमदिल्लाहअपनी ज़िंदगी अब रास आई है ।। हमारी बे सरो - सामानी कैसा रंग लायी है । तसौउर में तेरी सूरत कोअकसर खींच लाई है जिसे कहती है दुनिया हश्र का मैदान ए जौहर , हक़ीक़त में तमाशा - गाहे ,शाने मुस्तफ़ाई है । न होगा हश्र में कोई किसी का पूछने वाला, मेरे सरकार उम्मीदे शफ़ाअत खींच लाई है । सरे महशर गुनहगारों का आँसू कौन पोछेगा, मेरे मौला दोहाई है मेरे आक़ा दोहाई है । मुसीबत में परेशानी में हर ग़म में बहरसूरत, बहारे जाँफेज़ा बनके तुम्हारी याद आई है । बेहम्मदिल्लाह हैजौहर गदाये साक़ीये कौसर, शहंशाही को जिस पे नाज़ है मेरी गदाई है ।

नाते-पाक

मेरी आँखों में जब से आपकी सूरत समाई है । बेहमदिल्लाहअपनी ज़िंदगी अब रास आई है ।। हमारी बे सरो - सामानी कैसा रंग लायी है । तसौउर में तेरी सूरत कोअकसर खींच लाई है जिसे कहती है दुनिया हश्र का मैदान ए जौहर , हक़ीक़त में तमाशा - गाहे ,शाने मुस्तफ़ाई है । न होगा हश्र में कोई किसी का पूछने वाला, मेरे सरकार उम्मीदे शफ़ाअत खींच लाई है । सरे महशर गुनहगारों का आँसू कौन पोछेगा, मेरे मौला दोहाई है मेरे आक़ा दोहाई है । मुसीबत में परेशानी में हर ग़म में बहरसूरत, बहारे जाँफेज़ा बनके तुम्हारी याद आई है । बेहम्मदिल्लाह हैजौहर गदाये साक़ीये कौसर, शहंशाही को जिस पे नाज़ है मेरी गदाई है ।

नाते-पाक

ज़बाँ पर नाम जब आया तुम्हारा,या रसूल्ललाह। दिया तूफाँ ने घबड़ा कर सहारा,या रसूल्ललाह।। न पाएगा अगर तेरा सहारा,या रसूल्ललाह। कहाँ जाएगाअब ये ग़म का मारा,या रसूल्ललाह।। ख़ुदा शाहिद वहआजाते हैं दम में दसतगिरी को, जहाँ दिल से किसी ने भी पुकारा,या रसूल्ललाह। तेरी अज़मत,तेरी शौकत,तेरी रिफअत,की मिदहत से, नहीं ख़ाली कोई कुर्आँ का पारा,या रसूल्ललाह। तलातुम ख़ेज़ मौजों में तुम्हारा नाम लेते हीं, नज़र आनेे लगा हरसू किनारा,या रसूल्ललाह। नज़ा मे कब्र में महशर में मिज़ानेअदालत पर, तुमहीं हो बे सहारों के सहारा,या रसूल्ललाह। तुम्हारा नाम लेवा है, तुम्हारा दिल से शैदा है, चमक जाए न क्यों जौहर तुम्हारा,या रसूल्लला।

नाते-पाक

जब सामने गुम्बदे ख़जरा हो, अरमानों की हालत क्या होगी । जो शम्मा को रौशन देखेंगे, परवानो की हालत क्या होगी ।। जिस दिल में नबी की उल्फत का, इर्फान मचलता रहता हो। उस दिल के सफीने के आगे,तूफानों की हालत क्या होगी ।। दनदाने - नबी मजरुह हुए, जिस वक्त ख़बर पहुंची होगी । उस वक्त अवैसे क़रनी के, दनदानों की हालत क्या होगी ।। ऐ सोज़े दोरूँने-इश्क़ ठहर, सरकार मेरे घर आएँगे । उस वक्त मेरी नम आँखों कि, अरमानों की हालत क्या होगी ।। ये ईश्क़े नबी की राहगुज़र ,दुशवार बहुत हैं ऐ जौहर । लरज़ाँ हैं जहाँ अक़लो-दानिश, नादानो की हालत क्या होगी ।।

नाते-पाक

इश्क़ की चोटी बड़ी उँची है सर होने को दो। जलवये जाना का यारो दिल में घर होने तो दो।। इंक़लाबे - नव बहर नव अाएगा फिर शान से , दोस्तो आहों में पहले कुछ असर होने को दो।। वह नवाज़ेंगे, नवाज़ेंगें, नवाज़ेंगें ज़रूर, दामने इसियाँ को पहले तर बतर होने तो दो। वह बुलायेंगे, बलायेंगे, बुलायेंगे जनाब, हिज्र में सरकार के कुछ आँख तर होने तो दो। फासले मंज़िल के सिमटेगें मियाँ जौहर ज़रूर। कूए तैबा की तरफ अपना सफर होने तो दो।

नते-पाक

फलक पे चाँद नहीं है के आफ़ताब नहीं । जमाले रूए नबी का मगर जवाब नहीं ।। लबे नबी की मैं तशबीह किससे दूँ आख़िर । चमन में एक भी ऐसा कहीं गुलाब नहीं ।। तेरा जवाब भी लाए कोई तो क्या लाए । तू लाजवाब है तेरा कोई जवाब नहीं ।। दरे रसूल से मायूसी और नाकामी । हर एक सवाल का, बस एक है जवाब नहीं ।। कभी-कभी मुझे होती है महवियत ऐसी । कोई सवाल नहीं है कोई जवाब नहीं ।। मैं बेहिसाब हीं बकसा गया बरोज़े हेसाब । हेसाबे सय्यदे आलम तेरा हेसाब नहीं ।। नबीये उम्मी का कोई कहीं मशीलो नज़ीर । ये एक सवाल है जिसका कोई जवाब नहीं ।। न नाम आता हो जिसमें बेलाले हब्शी का । किताबे इश्क़ो मोहब्बत का कोई बाब नहीं ।। जो उनकी सिरते अक़दस से दूर रहता है । मेरी नज़र में कभी भी वह कामयाब नहीं ।। अजीब नात सुनाई है आज जौहर ने । सदा ये बज़्म से आई कोई जवाब नहीं ।।

नाते- पाक

सोकुँ बख़्शे दिले हर नातवाँ है। नबी का नाम योँ विरदे ज़बाँ है।। जबीं अपनी है उनका आस्ताँ है। ज़मीं के दू-बदू अब आसमाँ है ।। फराज़े अर्शो कुर्सी से गुज़र कर, नबी का हुस्न हुस्ने ला मकाँ है । वह बख्शें सायये दामाने रहमत, यही एक आरज़ू दिल में नेहाँ है। मोअत्तर है हर एक ज़र्रा यहाँ का, मदीना है के गुलज़ारे जेनाँ है । बफैज़े हज़रते हस्सान शाहा, दिले जौहर भी तेरा मदहखा़ँ है।

नाते- पाक

बहुत तलाश किया है गली-गली मैंने । कहीं न पाया मगर आप सा नबी मैंने।। निगाहे साक़िये कौसर से आज पी मैंने । बदल दिया हैअबअंदाज़े मयकशी मैंने ।। तुम्हारे ग़म को जगह देके,गोशय दिल में । बलंद कर लिया , मेयारे ज़िंदगी मैंने ।। किसी के सामने दस्ते सवाल क्यों उठता । तुम्हारे दर से लिया दर से आगही मैंने ।। सफीना डूबता अपना तो डूबता कैसे । तुम्हारा नाम लिया था अभी-अभी मैंने ।। भूला दिया तुम्हें नाकामियों के आलम मेे। गुनाह ये भी किया है कभी-कभी मैंने ।। यक़ीन जान लो जौहर के आगही के लिए । ख़्यालो फिक्र में ले ली है ताज़गी मैने ।।

नाते-पाक

नसीब अपना हम औज पर देख लेते। तेरा - जलवा पेशे नज़र देख लेते ।। कभी ऐ शहे बहरो -बर देख लेते । मदीने की शामो-सहर देख लेते ।। तक़ाज़ाए क़्लबो जिगर देख लेते। दरे पाके ख़ैरुल बशर देख लेते ।। तड़पना ग़मे हिज्र में काम आता, जो शाहा मुझे एक नज़र देख़ लेते। इधर होता काबा उधर तेरा रौज़ा, इधर देखकर फिर उधर देख लेते। करम से तुम्हारे वह दिन काश आए, के जौहर भी नूरी नगर देख लेते।

नाते- पाक

नज़र में रूये नबी का जमाल रखा है । बड़े जतन से ये तौफा सम्हाल रखा है।। ख़ुदा का शुक्र है गुदरी में लाल रखा है । यही निजात का रस्ता निकाल रखा है ।। नबी वह ऐसा के उम्मी भी और मुअल्लिम भी, जहाँ को वर्तये हैरत में डाल रखा है। नज़ा में कब्र में महशर में या सरे मिज़ाँ, बस आपहीं ने हमारा ख़याल रखा है । पहुँच गए हो मदीने में वायज़ो सम्हलो, ये क्या के ज़िक्रे जेना यूँ उछाल रखा है। यक़ीन है मुझे दीदार आप का होगा , मगर ये क्या के क़यामत पे टाल रखा है। होज़ूर आप जो चाहेंगे हश्र में होगा, इसी ख़याल ने हम को नेहाल रखा है। बशर हुज़ूर हैं उनको मलायका हैं गवाह, ख़ुदा ने नूर के साँचे में ढाल रखा है । नबी के नाम का एजाज़ देखिए जौहर, सफीना मौजे बला ने संभाल रखा है ।

नाते- पाक

मुहब्बत की सदा मचलेगी जब,मोमिन के सिने में । मुक़द्दर औज पर होगा,नज़र होगी मदीने में।। मये हुब्बे नबी है,दिल है और आँखें हैं,मंज़र है, बला का हुस्ने फितरत है,हमारे आबगिने में। नबी के नाम का जौहर है,कुछ इस तरह सीने में, के तूफाँ आ गया है,चाराजुई को सफीने में । कोई किरदार देखे सैय्यदे किरदारे रहमत का, के जिसकाअक्स है,आलम के इसलाही नगिनेे में । शहंशाही ग़ुलामी हो, ग़ुलामी हो शहंशाही, नज़र वाह हो तो ऐ जौहर,मज़ा है ऐसे जीने में।

मेराज

सरे अर्श पल में पहुँचे और जा के लौट आए ,कोई शहसवार ऐसा न हुआ न है न होगा। (जौहर शफियाबादी)

नातिया-गजल

जिस दिल में शहे कौनो मक़ा जलवानुमा हो । वह दिल न क्यों अर्श के रूतबे से सिवा हो ।। सरकार मुझे ,चश्मे बसीरत वह अता हो । जब आँख खुले मेरी तो तू जलवानुमा हो।। बन जाए मेरी क़ब्र का हर ज़र्रा सितारा, जब ख़ाक उड़े मेरी मदीने की हवा हो । ता हद्दे नज़र फैला हो अनवार का आलम, यादे - शहे कौनैन में कुछ ऐसा समा हो । तुरबत में मेरी जब हो नकिरैन की आमद, सरकार ये सर आप के क़दमों में झुका हो ।

नाते-पाक

पलकों पे लिए हस्रते दीदार गई है। रौज़े पे तेरे नर्गीसे बीमार गई है ।। क्या जाने कोई मंज़िले सरकारे दो आलम, जिबरील की परवाज़ भी थक हार गई है । यादे शहे कौनैन में रूहे तने लागर, सौ बार जो आई है तो सौ बार गई है । क्या लुत्फ़ सरे हश्र है कि उम्मते महबूब, होकर तेरी ज़़ुल्फ़ो में गिरफ्तार गई है । आकर तेरी महफिल से मलायक की जमाअत, दामन में लिए दौलते बेदार गई है । लगता है मेरे फिक्ररो तसौउर के नगर में, बुढ़िया कोई फिर मिश्र के बाज़ार गई है । दुनिया की मुझे फिक्र न ओक़बा की ख़बर है, जिस दिन से नज़र कुचए दिलदार गई है । मौला तेरी उलफ़्त ने अजब हौसला बख़्शा, अब गर्दिशे क़िस्मत भी मेरी हार गई है । ज़ाहिद ये तसउर की नज़र खूब नज़र है, इस पार जो ठहरी है तो उस पार गई है । मेराजे मोहब्बत का ये एज़ाज तो देखो, जौहर की सदाक़त भी सरे दार गई है ।

मनक़बत

मेरा तन है मेरा मन है मोईनुद्दीन चिश्ती का। मेरे हाथों में दामन है मोईनुद्दीन चिश्ती का ।। दुआए रहमते आलम अताए सरवरे आलम, ये दर्पण किसका दर्पण है मोईनुद्दीन चिश्ती का। ज़मीने हिन्द पर शमये वलायत जगमगाई है, तजल्ली गाहे गुलशन है मोईनुद्दीन चिश्ती का। जहाँ शहनाइयाँ बजती हैं कलमे की शरीयत की, वही पुरनूर आंगन है मोईनुद्दीन चिश्ती का । अदा हो क़ौल हो या फेल हो सब आईना बन कर, ये चिलमन किसका चिलमन है मोईनुद्दीन चिश्ती का । सरापा हुस्न कहिये नाएबे ख़ैरुलवरा कहिए, वहीं का रंगो-रोग़न है मोईनुद्दीन चिश्ती का । अक़ीदत ने वुज़ू की है मुहब्बत ने किये सज्जदे, मेरी आँखों में सावन है मोईनुद्दीन चिश्ती का। शरीयत ओ तरीक़त का है जौहर मरकज़ो म्मबा, यही दरबारो मसकन है मोईनुद्दीन चिश्ती का ।

नाते-पाक

क्या समझे कोई रुतबये ज़ीशाने मोहम्मद। हैं दोनों - जहाँ ताबये फरमाने मोहम्मद ।। ख़ातिर में कभी लाते नहीं शाहे जहाँ को , अल्लाह रे ये शाने गदायाने मोहम्मद । जिबरील भी आते नहीं बे इज़ने हूज़ुरी , किससे हो बयाँअज़मते अैवाने मोहम्मद। हो मस्जिदे अक़सा के काबे का दरो-बाम, वह कौन है जिस पर नहीं एहसाने मोहम्मद। उम्मत का हर एक फर्द जगह पाए हुए है, क्या समझे कोई उसअते दामाने मोहम्मद। खुर्शीदे क़यामत से हेफाज़त को ख़ुदाया, मिल जाए मुझे सायए दामाने मोहम्मद । आका़ इसे मिलजाए कभी इज़ने होज़ूरी, जौहर भी हैअदना सा सना ख़ाने मोहम्मद।

नातिया अशआर

जो नज़र नज़र को नवाज़ दे, मुझे उस नज़र की तलाश है । तेरे दर्द से जो हो आशना, मुझे उस जिगर की तलाश है । तेरा ज़िक्र मेरा वज़ुए दिल, तेरी फिक़्र मेरी नमाज़े जा़ँ, तेरा इश्क़ बैते हरम बने, मुझे उस सहर की तलाश है । (जौहर शफियाबादी)

भोजपुरी-नात

धन$-धन$ धरती पर अइलीं नबी जी, खोलनी प्रीतिया के द्वारsरे । मह-मह महकल बेलिया,चमेलिया ,गमकी उठलsकचनारsरे ।। चम-चम$ चमकल चाँद$ सुरूजवा, जग-मग सब संसारs रे । चह-चह चहकल,नेहिया-चिड़ैइया,सगरी भइल उजियारsरे ।। प्रीत$के रीत में धर्म धरोहर, मज़हब के संचारs रे । क्षमा ,दया-तप,त्याग,मनोबल, नबी जी कहस उपकारsरे ।। पग-पग, क्षण-क्षण, पल-पल सुमिरीं, नेहिया के महिमा अपारsरे । जौहर$जतनsजपs-तपs स्रध्दा के, अउर सरस$-सत्कार रे ।।

नाते-पाक

मरना लिख दे न मेरे नाम से जीना लिख दे। ऐ मेरे कातिबे तक़दीर मदिना लिख दे ।। कासये दिल की तमन्ना का भरम रखना है, इस अंगूठी पे शहेदीं का नगिना लिखदो । मुश्को-अम्बर का हो मोहताज कफन जिसका हो, मेरे हिस्से में शहेदीं का पसीना लिख दे । ज्ज़बये ईश्क़े मोहम्मद में ताज़ा हरदम, वैशकरनी की तरह मेरा भी सीना लिख दो । लिखने वाले तेरे एहसान पे क़ुर्बा जाऊँ, लौहे दिल पर मेरे एक बार मदीना लिख दे। हर घड़ी उनका तसौउर हो मेरी आँखों में, जलवये नूरे ख़ुदा ज़ीना ब ज़ीना लिख दे। जामे वहदत से ख़ूदी का हो छलकता जौहर, साक़ीये रोज़े जज़ा साग़रो-मीना लिख दे ।

नाते-पाक

रमज़े यासीन हैं, ताहा हैं ,तुम्हारी आँखें । कितनी अल्लाह को प्यारी हैं नयारी आँखें ।। वज़हे कून वजहे तख़लीक़े दो आलम तुम हो, तेरी आँखें के ही सदक़े में हैं सारी आँखें । ये करम तेरा है सदक़ा हैं एनायत तेरी, मेरी आँखों में भी बसती हैं जौबारी आँखें । जाने सिद्दीक़ो उमर रूहे उस्मानो हैदर, आँखें आँखों में हैं इरफानों की जारी आँखें । फेंककर एक दिन तलवार ये उमर कह उठे, दामने दिल में हैं पुरनूरो दुलारी आँखें । ये मेरी अर्जे जज़्बात की दौलत देखो, इश्क़ में आजकत जौहर की हैं भारी आँखें

नाते-पाक

काश सज्जदा हो मोयस्सर, उस ज़मीने पाक पर । जिसकी अज़मत का फरेरा है नसब अफलाक पर ।। दौलते कवनो मकाँ जिनके वसिले से मिली । नाज़ कैसे ना करूँ में, उस शहे लोलाक पर ।। उनके ग़म में जो भी हो जातीं हैं आँखें अश्कबार । रश्क करतीं है घटा उस दिदये नम नाक पर ।। अज़मते शाने रिसालत देखने वाले तूँ देख । अर्शे आज़म ज़ेरे पा है और विस्तर ख़ाक पर ।। दम में हो काफूर ग़म, सारी बलाये दूर हो । काश वो रख दें कदम,मेरे दिले सदचाक पर।। चूम लें, बढ़कर गुलेतर और कलिया हो नेसार । वह अगर रख दें कदम दम भर, ख़सो ख़शाक पर।। ज़ेबे दस्तरख़्वान गुठली और कभी नाने जौवीं । मेरा दिल और मेरी जाँ सदक़े तेरी ख़ोराक़ पर ।। नूरे हक़ है जामये ख़ैरुल बशर में जलवागर, है फिदा सारा जहाँ उनके उसी पोशाक पर। ग़म न कुछ रोज़े-जज़ा का और न इसयाँ का खौफ, फैसला जौहर ने छोड़ा है ,रसूले - पाक पर।

नात शरीफ

वह शजर शजर नहीं है वह हजर हजर नहीं है। तेरा नूर जो न पाये वह क़मर क़मर नहीं है। तेरे इश्क़ में हो मरना तेरे इश्क़ में हो जीना, जो न तेरा दर्द पाले वह जिगर जिगर नहीं है। वह है शहरे कम नसीबाँ जहां हो ना तेरा चर्चा, तेरे ज़िक्र से हो खाली तो नगर नगर नहीं है। तुझे ढूंढता है हर सू तेरे नाम का दीवाना, जो न तेरा नक़्शे पा हो तो डगर डगर नहीं है। ग़मे आशिक़ी सलामत तो कठिन नहीं है मंज़िल, जो तुझे न देख पाये वह नज़र नज़र नहीं है। वह जो होगा रोज़े महशर मुझे सब पता है जौहर, ग़मे मुस्तफ़ा सलामत तो लटर पटर नहीं है। 【डॉ० जौहर मियाँ शफियाबादी 】

नाते-पाक

जिस दिल में शहे कौनो मकाँ जलवानुमा हो। वह दिल न क्यों अर्श से रूतबे में सिवा हो ।। सरकार मुझे ,चश्मे वसीरत वह अता हो, जब आँख खुले मेरी तो तू जलवानुमा हो । बनजाए मेरी क़ब्र का हर ज़रा सितारा, जब ख़ाक उड़े मेरी मदीने की हवा हो । ता हद्दे नज़र फैला हो अनवार का आलम, यादे शहे - कौनैन में ,कुछ ऐसा समा हो । तुर्बत में मेरी जब हो नकिरैन की आमद, सरकार ये सर आप के क़दमों में झुका हो।

नाते-पाक

दिल वही दिल है जो रहमत का तमन्नाई हो। आँख वह आँख के बस उनका तमाशाई हो।। लाख जलवों का कोई उनके तमन्नाई हो। वह अगर जलवा करें कौन तमाशाई हो।। काश ऐसे में के जब जान पे बन आई हो। उनकी आमद की ख़बर बादे सबा लाई हो।। हस्रते दिल पे मुसर्रत की घटा छाई हो । आप हों जलवा कुना और क़ज़ाआई हो।। सामने गुम्बदे ख़जरा हो जबीँसाई हो। काश क़िसम्त से कभी ऐसी घड़ी आई हो।। महकी-महकी सी फेज़ाओं में हो ख़ुशबूये करम। ठंडी-ठंडी वह मदीने से हवा आई हो ।। मैं पढ़ूूँ सरवरे आलम का क़सीदा जौहर । मेरे शेरों में तअशुर की जो गहराई हो ।।

नाते-पाक

यही ताबिशे ख़ुदी है,यही बख़्ते चश्मे बीना। मेरे सामने है काबा,मेरे दिल में है मदीना ।। ये नसीब की लगन है,यही इश्क़ का चलन है, पीए जामे लुफ्तेअहम्मद,जिसे रासआये पीना। मेरी हम ज़बाँ शरीयत,मेरी राज़दाँ मशियत, के वेलाए शाहे दीं का,मेरे पास है खज़िना । वहजो मोतबर है उनका,जो गदाए दर है उनका, वही जानता है मरना,वही जानता है जीना। कभी ज़िक्रे पाके सरवर,कभी हुब्बे आले अतहर, मेरी मौत का सहारा,मेरी ज़िस्त का क़रीना। मेरी नात सुनके जौहर,यही कह उठे सुखनवर, वह निखर गया है सोना,वह चमक उठा नगीना ।

नाते-पाक

शहेदीं के हैं नात-ख़ाँ कैसे-कैसे । निगाहों में फैले समाँ कैसे-कैसे ।। ये शाने इनायत है नज़रे करम की, खुले हम पे राज़े नेहां कैसे-कैसे । सहाबा की हिम्मत की तारीफ़ क्या हो, हुए फूल कोहे गेरां कैसे-कैसे । कोई इन्नाआतैना,पढ़ के तो देखे, हुए सर्द जोरे बयां कैसे-कैसे । शहेदीं का इसमें गरामी जो आया, महकने लगे गुलसेताँ कैसे-कैसे । फिदा दींने हक़ पर ज़मीने बला पर, हुए हाशमी नौजवाँ कैसे-कैसे । मेरी नात गोई का जौहर तो देखो, हुए सर्द अहले ज़बाँ कैसे-कैसे । नबी जी की उलफ़्त में जौहर मियाँ ने, उगाये हैं बागे़, जेनाँ कैसे-कैसे ।

नाते-पाक

जलवा देखूँ कभी उनका कभी चेहरा देखूँ । दीदये शौक़ बता तुही मैं क्या-क्या देखूँ ।। या ख़ुदा बस ये तमन्ना है हमेशा देखूँ । हुस्ने पर्दा भी रहे और बे पर्दा देखूँ ।। पूरी कब होती है अपनी ये तमन्ना देखूँ । सबजे़ गुम्बद के क़रीं जाके उजाला देखूँ ।। क्यों यहाँ रह के अंधेरा ही अंधेरा देखूँ । सुये तैबा मैं चलूँ और सबेरा देखूँ ।। अपनी आँखों में इलाही वह बसीरत दे दे । देखना चाहूँ तो मैं अर्शे मुअल्ला देखूँ ।। जिनको जाना था गये जायेंगे जाने वाले । जाने कब आता है जाने का बुलावा देखूँ ।। हश्र में प्यास की शिद्दत जो बढ़े तो जौहर । हाथ में साक़ीये कौसर के प्याला देखूँ ।। या इलाही रहे महफूज़ ये जौहर हरदम । सीरते सैय्यदे आलम का नमूना देखूं ।।

गजल

मन-मंदिर में लागल आग। याद के तहरे जागल आग।। सनमुख भइले जब हमरा। तब शंका के भागल आग।। अनकर घर बचाई ऊ का। जेकरा घर में लागल आग।। ई अचरज के बात भइल बा। गंगा में बा लागल आग ।। जात-धरम के बा मतलब के। कीनल-बेसहल तातल आग ।। जौहर बस ई त्याग बुताई। नफरत के बा डालल आग ।।

गजल

साध सावन के, उमड़ल घटा देख के । आँख पथरा गइल, रास्ता देख के ।। भाँप जानीं सजी, भाव मजमून के । हम लिफाफा प टाँगल, पता देख के ।। तहरा वादा करे के, गरज का रहे । जी रहल बानीं हम, आसरा देख के ।। प्रीत के रीत देखीं ना, आ जाईं अब । आँख भर जाई रउवो, दशा देख के ।। थाह केहू के इहवाँ, मिलल बा कठिन। लोग बोलत सभे बा, हवा देख के ।। दूसरा के कहीं का, शरम आ रहल । खुद से खुद के ए जौहर दगा देख के ।।

नाते- पाक

आगतम् भूतलम् स्वागतम् मंगलम्। स्वागतम् स्वागतम् हे नबी मंगलम्।। दुखःहरम् सुखहरम् जीवनम् मंगलम्। मंगलम् हे नजी हे शफी मंगलम्।। मंगलम् कारणम् सरजनम् मंगलम्। मंगलम् प्राण दाता मही मंगलम्।। मंगलम् हे हबीबे खु़दा मंगलम्। मंगलम् सारसर्वम् तुरी मंगलम्।। मंगलम् वैभवम् आमना मंगलम्। मंगलम् हे हलीमा सुधी मंगलम्।। श्रावनम् मंगलम् भावनम् मंगलम्। मण्डपम् मण्डिपम् नवयती मंगलम्।। कौशलम् जौहरम् निर्मलम् मंगलम्। शीतलम् सुफ़लम् युग जयी मंगलम्।।

नाते-पाक

जग को तोहफा मिला आमने-सामने । वजहे- तख़लीक़ था आमने -सामने ।। रशके हुस्ने जहाँ, आगए मुस्तफा । चाँद शर्मा गया , आमने -सामने।। पहुंचे नुरे - खुदा, जश्ने मिलाद में । बा ख़ुदा था ख़ुदा आमने-सामने ।। कलमये अज़मते मुस्तफ़ा देखिए। अर्श पर था लिखा आमने-सामने।। रौज़ए नूर पर फज़ले रहमान की । झूमती है घटा आमने -सामने ।। लातोउज़्ज़ा गिरे मुँह के बल एक बयक। आए ख़ैरुलवरा आमने - सामने ।। जौहरे बे नवा , वा सिफे मुस्तफा । कर रहा है दुआ आमने -सामने।।

नाते-पाक

आस्ताँ गर तेरा नहीं होता । अपना सज्जदा अदा नहीं होता।। दिल झुके उनके आस्ताने पर , सर का सज्जदा रवा नहीं होता । बोल उठा बे ज़बान कंकड़ भी , वह जो चाहें तो क्या नहीं होता । जिसको अपना पता वह देते है, उसको अपना पता नहीं होता । दामने पाक में जगह पाली, खौफ़े महशर ज़रा नहीं होता । हम भटकते ही उम्र भर रहते, उन का गर नक्श़े पा नहीं होता । उनके दर का ग़ुलाम जो भी है, उसकी झोली में क्या नहीं होता । जुज़ ख़ुदा के किसी से ऐ जौहर, नात का हक़ अदा नहीं होता ।

नाते पाक

जब रौज़ये अक़दस पर,एे बादे सबा जाना । कहना के तड़पता है, दीदार को दिवाना ।। सरशारे वेला है ये मत छेड़ सबा इसको, दीवाना मोहम्मद का,दीवाना है दीवाना।। बरसात का मौसम है, सावन का महीना है , पलकों से मेरी मिलकर,ऐ काली घटा जाना। सरकार कि उलफ्त ने फैज़ान ये बख़्सा है , पैमाना ना है मैयख़ाना मैयख़ाना है पैमाना। बातिल को अंधेरों का क्या खौ़फ तुझे जौहर, रहमत कि अताओं से लबरेज़ है खु़मख़ाना।

नाते-पाक

शहेदीं के हैं नात-ख़ाँ कैसे-कैसे । निगाहों में फैले समाँ कैसे-कैसे ।। ये शाने इनायत है नज़रे करम की, खुले हम पे राज़े नेहां कैसे-कैसे । सहाबा की हिम्मत की तारीफ़ क्या हो, हुए फूल कोहे गेरां कैसे-कैसे । कोई इन्नाआतैना,पढ़ के तो देखे, हुए सर्द जोरे बयां कैसे-कैसे । शहेदीं का इसमें गरामी जो आया, महकने लगे गुलसेताँ कैसे-कैसे । फिदा दींने हक़ पर ज़मीने बला पर, हुए हाशमी नौजवाँ कैसे-कैसे । मेरी नात गोई का जौहर तो देखो, हुए सर्द अहले ज़बाँ कैसे-कैसे । नबी जी की उलफ़्त में जौहर मियाँ ने, उगाये हैं बागे़, जेनाँ कैसे-कैसे ।

नाते-पाक

जलवा देखूँ कभी उनका कभी चेहरा देखूँ। दिदये शौक़ बता तुही मैं क्या-क्या देखूँ ।। या ख़ुदा बस ये तमन्ना है हमेशा देखूँ । हुस्ने पर्दा भी रहे और बे पर्दा देखूँ ।। क्यों यहाँ रहके अंधेरा ही अंधेरा देखूँ, सूए तैबा मैं चलूँ और सबेरा देखूँ । अपनी आँखों में इलाही वह बसिरत दे दे, देखना चाहूँ तो मैं अर्शे मुअल्ला देखूँ ।। जिनको जाना था गये,जायेंगे जाने वाले । जाने कब आता है,जाने का बुलावा देखूँ ।। हश्र में प्यास की शिद्दत जो बढ़े तो जौहर । हाथ में साक़ीये कौसर का प्याला देखूँ ।।

नाते-पाक

मेरी आँखों में जब से आपकी सूरत समाई है । बेहमदील्लाह अपनी ज़िंदगी अब रास आई है ।। हमारी बे सरोसामानी कैसा रंग लाई है । तसौउर में तेरी सूरत कोअकसर खींच लाई है ।। जिसे कहती है दुनिया हश्र का मैदान ऐ जौहर, हक़ीक़त में तमाशागाहे शाने मुस्तफ़ाई है । न होगा हश्र में कोई किसी का पूछने वाला, मेरे सरकार उम्मीदे शफ़ाअत खींच लाई है । सरे महशर गुनहगारों का आँसू कौन पोंछेगा, मेरे मौला दोहाई है मेरे आक़ा दोहाई है । मुसीबत में, परेशानी में, हर ग़म में बहरसूरत, बहारे जाँफेज़ा बन कर तुम्हारी याद आई है । बेहमदील्लाह है जौहर गदाए साक़ीए कौसर, शहनशाही को जिस पे नाज़ है मेरी गदाई है ।

नाते-पाक

जिस दिल में शहे कौनो मकाँ जलवा नुमा हो । वो दिल न क्यों अर्श के रूतबे से सिवा हो ।। सरकार मुझे चश्मे बसीरत वह अता हो । जब आँख खुले मेरी तो, तू जलवा नुमा हो ।। ऐ क़ाश तसौउर तेरा इस हाल पे छोड़े । तेरा जो पता पाउँ तो अपना न पता हो ।। ताहदे नज़र फैला हो अनवार का आलम । यादे शहे कौनैन में कुछ ऐसा समा हो ।। बन जाए मेरी क़ब्र का हर ज़र्रा सितारा । जब ख़ाक उड़े मेरी मदीने की हवा हो ।। तुरबत में मेरी जब हो नकिरैन की आमद । सरकार ये सर आप के क़दमों में झुका हो ।।

नात

जो नज़र-नज़र को नवाज़ दे, मुझे उस नज़र की तलाश है । तेरे दर से जो हो आशना, मुझे उस जिगर की तलाश है ।। तेरा ज़िक्र मेरा वज़ुए दिल, तेरी फिक़्र मेरी नमाज़े जा़ँ । तेरा इश्क़ बैते हरम बने, मुझे उस सहर की तलाश है ।। तेरा नक़्शे पा मेरे साक़ीया, मेरी ज़िन्दगी का है रहनुमा । किसी राज़दाँ की है जुस्तजू, न तो राहबर की तलाश है ।। मैं असीरे हलक़ए ईनोआँ, तूँ अमीरे किश्वरे लामकाँ । मेरी कायनाते हयात को, तेरी एक नज़र की तलाश है ।। ऐ हवाए लाला व रंगों बू, मेरे रू-ब-रू है वो ख़ूब-रू । कोई कह दे आज हीं ईद है, मुझे उस ख़बर की तलाश है ।। वही क़ैदे नफ्स का मुब्तला जिसे कहिए जौहरे पुर ख़ता । वह तलाशे दैरो हरम करे, जिसे तेरे दर की तलाश है ।।

Naat Sharif

Comming Soon

Baridi

Khwaja Mohammad Imamuddin Nizami reverently known as Dr. Jauhar Shafiyabadi. Dr. Jauhar Shafiyabadi got his ‘Takhallus’ or pen name ‘Jauhar’ (Jauhar means ‘Talent/Skill/Art’) by his Peer-o-Mursheed or spiritual master .